(अमिताव रॉय)
कोलकाता, 19 जनवरी (भाषा) पश्चिम बंगाल में 2011 से लगातार चुनावी विफलताओं के बावजूद, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) को 2026 के राज्य विधानसभा चुनाव में चुनावी उलटफेर की उम्मीद है। हाल ही में पार्टी का राज्यव्यापी जनसंपर्क कार्यक्रम संपन्न हुआ और उसका दावा है कि सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के प्रति जनता का असंतोष बढ़ रहा है।
माकपा केंद्रीय समिति के सदस्य सुजान चक्रवर्ती ने कहा कि “चुनावी मुकाबले को द्विध्रुवीय बनाने के तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के प्रयास विफल होंगे” क्योंकि लोग “वाम मोर्चे में एक तीसरे विकल्प की तलाश कर रहे हैं”।
उन्होंने दावा किया कि पिछले साल नवंबर-दिसंबर में आयोजित 1000 किलोमीटर लंबी ‘बांग्ला बचाओ यात्रा’ ने माकपा के नेतृत्व वाले गठबंधन में लोगों की रुचि फिर से पैदा की।
बंगाल के कोने-कोने में 20 दिन तक चले मार्च के दौरान मिली “अच्छी प्रतिक्रिया” से उत्साहित होकर, पार्टी अब भी जिलों में स्थानीय स्तर पर रैलियां आयोजित कर रही है।
चक्रवर्ती ने मीडिया से बातचीत में दावा किया, “आगामी चुनावों में ‘बांग्ला बचाओ यात्रा’ का असर जरूर दिखेगा। लोग तृणमूल और भाजपा से तंग आ चुके हैं। वे बंगाल के राजनीतिक माहौल को अपने ही गुटों में विभाजित करके वामपंथी दलों को दूर रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह योजना विफल हो जाएगी।”
यादवपुर निर्वाचन क्षेत्र से माकपा के पूर्व लोकसभा सदस्य ने आरोप लगाया कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पार्टी ने बंगाल में भाजपा को पांव पसारने की जगह दे दी है।
चक्रवर्ती ने कहा कि अगर विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों से हटकर “मंदिर-मस्जिद की राजनीति” हावी हो जाती है तो बंगाल का धर्मनिरपेक्ष सामाजिक ताना-बाना नष्ट हो जाएगा।
माकपा ने 29 नवंबर से ‘बांग्ला बचाओ यात्रा’ का आयोजन किया था, जो एक राज्यव्यापी आंदोलन है। पार्टी का दावा है कि यह अभियान तृणमूल के शासन में “अन्याय, लूट और व्यवस्थित लोकतांत्रिक क्षरण” को उजागर करेगा और भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की “जनविरोधी नीतियों” का मुकाबला करेगा।
एक अन्य पार्टी नेता के अनुसार, यह मार्च “लोकतंत्र को बचाने, लोगों के मतदान के अधिकारों की रक्षा करने, स्कूली शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा की रक्षा करने और कमजोर परिवारों को सूक्ष्म ऋणों और लॉटरी के खतरे से बचाने” के लिए एक राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा है।
तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता कुणाल घोष ने चक्रवर्ती के आरोप को खारिज करते हुए दावा किया कि राज्य के राजनीतिक मानचित्र में माकपा की प्रासंगिकता खत्म हो गई है।
उन्होंने कहा, “उन्हें ‘माकपा बचाओ यात्रा’ का आयोजन करना चाहिए।”
पश्चिम बंगाल पर 1977 से 2011 तक लगातार शासन करने के बाद, वामपंथी दल पिछले एक दशक में हाशिए पर पहुंच गए हैं।
यह पार्टी 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों और पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनावों में अपना खाता खोलने में विफल रही, जिसके परिणामस्वरूप इसने प्रमुख विपक्षी दल का दर्जा भी खो दिया जो अब भाजपा के पास है।
भाषा प्रशांत वैभव
वैभव