(तस्वीरों के साथ)
(जी मंजूसाईनाथ)
बेंगलुरु, तीन जून (भाषा) डोड्डा अलाहल्ली गांव की धूल भरी गलियों से लेकर कर्नाटक के सर्वोच्च राजनीतिक पद तक, डी. के. शिवकुमार चार दशक लंबी यात्रा के बाद आज उस मुकाम पर पहुंच गए जिसका सपना उन्होंने वर्षों पहले देखा था।
उनका सपना कर्नाटक का मुख्यमंत्री बनना था और आज 64 साल की उम्र में यह पूरा हो गया।
इसे मुश्किल समय में कांग्रेस के ‘संकट मोचक’ बनने और पार्टी एवं गांधी-नेहरू परिवार के प्रति वफादारी का ईनाम भी कहा जा सकता है।
शिवकुमार को ‘कनकपुरा बंदे’ के नाम से जाना जाता है, यानी कनकपुरा की ग्रेनाइट चट्टान। यह वही विधानसभा क्षेत्र है जिसका वह प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने कांग्रेस पार्टी के ‘संकट मोचक’ के रूप में भी ख्याति अर्जित की है।
उन्हें राजनीति में पहला बड़ा मौका 1985 में मिला जब उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर सथानूर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा, हालांकि वे असफल रहे। चार साल बाद, उन्होंने उस निर्वाचन क्षेत्र से जीत हासिल की और 1989 में विधानसभा में प्रवेश किया। तब से, उन्होंने लगातार आठ विधानसभा चुनाव जीते हैं।
पिछले कुछ वर्षों में, 64 वर्षीय नेता ने स्वयं को कांग्रेस पार्टी के प्रमुख वोक्कालिगा नेता के रूप में स्थापित किया है। वोक्कालिगा कर्नाटक के प्रमुख कृषि समुदायों में से एक है। कांग्रेस आलाकमान ने 2017 में शिवकुमार के राजनीतिक प्रबंधन कौशल की परीक्षा ली, जब उन्हें राज्यसभा चुनावों से पहले बेंगलुरु में गुजरात के 42 कांग्रेस विधायकों को पार्टी से जोड़े रखने की जिम्मेदारी सौंपी गई ताकि ‘क्रॉस वोटिंग’ को रोका जा सके।
वह पार्टी नेतृत्व की उम्मीदों पर खरा उतरे और गुजरात से कांग्रेस उम्मीदवार अहमद पटेल ने जीत दर्ज की।
कांग्रेस नेताओं के अनुसार इस घटना ने शिवकुमार को व्यक्तिगत और राजनीतिक रूप से भारी नुकसान पहुंचाया, क्योंकि उस दौरान आयकर विभाग ने उनसे जुड़ी संपत्तियों पर छापेमारी की। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि यह कार्रवाई राजनीति से प्रेरित थी। इसके बाद प्रवर्तन निदेशालय द्वारा कई छापे और तलाशी अभियान भी चलाए गए।
शिवकुमार को तीन सितंबर 2019 को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें 50 दिनों तक दिल्ली की तिहाड़ जेल में रखा गया। हालांकि, कई लोगों का मानना था कि वह कारावास से ‘डर’ जाएंगे या भाजपा के खेमे में चले जाएंगे, लेकिन कांग्रेस के प्रति उनकी निष्ठा और भी मजबूत होती नजर आई।
उनके संगठनात्मक कौशल, राजनीतिक दृढ़ता और पार्टी के प्रति प्रतिबद्धता ने कांग्रेस आलाकमान को प्रभावित किया, जिसने उन्हें 2020 में कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया। शिवकुमार ने कर्नाटक में कांग्रेस के लिए एक कठिन दौर में कार्यभार संभाला। पार्टी ने 2018 के विधानसभा चुनावों में खराब प्रदर्शन किया था और 2019 के लोकसभा चुनावों में यह झटका और गहरा गया, जब नरेन्द्र मोदी लहर के बीच कांग्रेस राज्य की 28 सीटों में से केवल एक सीट जीतने में कामयाब रही।
भाजपा ने 26 सीटें जीतीं जिनमें मांड्या से भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार सुमालता अंबरीश की सीट भी शामिल थी। कांग्रेस को एकमात्र जीत बेंगलुरु ग्रामीण से मिली, जिसे शिवकुमार के भाई डी.के. सुरेश ने जीता। लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के एक महीने बाद, एच.डी. कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली कांग्रेस-जद(एस) गठबंधन सरकार कांग्रेस और जद(एस) के कुछ विधायकों की अयोग्यता के बाद गिर गई। इनमें से कई विधायक बाद में भाजपा में शामिल हो गए और पार्टी को राज्य में चौथी बार सत्ता में लौटने में मदद मिली।
इसके बाद 18 सीटों पर हुए उपचुनाव कांग्रेस-जद(एस) गठबंधन के लिए किसी बुरे सपने सरीखे रहे, जिसमें भाजपा ने 15 सीटों पर जीत हासिल की।
खराब प्रदर्शन के बाद, तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दिनेश गुंडू राव ने इस्तीफा दे दिया, जबकि सिद्धरमैया ने कांग्रेस विधायक दल के नेता पद से इस्तीफा दे दिया। इन्हीं परिस्थितियों में कांग्रेस नेतृत्व ने 2020 में अपने भरोसेमंद शिवकुमार की ओर रुख किया। यह ऐसा निर्णय था जिसने बाद में राज्य में पार्टी को पुनर्जीवित किया।
उनके नेतृत्व में, कांग्रेस ने 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों में भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की और 224 सदस्यीय सदन में 134 सीटें जीतीं। निर्दलीय विधायकों के समर्थन से पार्टी की प्रभावी संख्या बाद में बढ़कर 140 हो गई।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान उन्हें एक और महत्वपूर्ण परीक्षा का सामना करना पड़ा, जब उन्होंने 2019 में कर्नाटक में कांग्रेस की एक सीट को 2024 में नौ सीटों तक बढ़ाकर फिर अपनी राजनीतिक सूझबूझ का प्रदर्शन किया। 2023 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की शानदार जीत के बाद, शिवकुमार को बेंगलुरु विकास और जल संसाधन मंत्रालय का प्रभार सौंपते हुए उपमुख्यमंत्री नियुक्त किया गया था।
कुछ नेताओं द्वारा राज्य इकाई के नेतृत्व में बदलाव की मांग के बावजूद, वह कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष भी बने रहे।
कांग्रेस द्वारा 2023 में सरकार बनाने के कुछ ही समय बाद, उस ‘‘समझौते’’ की खबरें सामने आईं, जिसके तहत यह तय हुआ था कि सिद्धरमैया पांच साल के कार्यकाल के पहले आधे हिस्से में मुख्यमंत्री के रूप में कार्य करेंगे और फिर शिवकुमार पदभार संभालेंगे। दोनों नेताओं ने इस दावे की न तो पुष्टि की और न ही खंडन किया।
हालांकि, 20 नवंबर, 2025 को कांग्रेस सरकार के ढाई साल पूरे होने के बाद, नेतृत्व परिवर्तन तथा सिद्धरमैया और शिवकुमार के बीच सत्ता संघर्ष को लेकर अटकलें तेज हो गईं। अंततः शिवकुमार शनिवार को यहां कांग्रेस विधायक दल के नेता चुने गए।
बेंगलुरु दक्षिण जिले के कनकपुरा कस्बे के पास डोड्डा अलाहल्ली गांव में केम्पेगौड़ा और गौराम्मा के घर 15 मई, 1962 को जन्मे शिवकुमार ने 1980 के दशक की शुरुआत में अपने कॉलेज के दिनों में राजनीति में प्रवेश किया। 1993 में शिवकुमार ने उषा से शादी की। इस दंपति की दो बेटियां ऐश्वर्या और आभरना और एक बेटा आकाश है।
भाषा हक अविनाश
अविनाश