(प्रदीप्त तापदार)
कोलकाता, आठ अप्रैल (भाषा) पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बीच विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत 90.83 लाख से अधिक नाम हटा दिए गए हैं, जिससे कई सीट का गणित बदल गया है। इससे तृणमूल कांग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों के लिए नयी अनिश्चितताएं पैदा हो गई हैं।
राज्य के कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.77 करोड़ रह गई है, लिहाजा दोनों प्रमुख दलों को इस महीने दो चरण में होने वाले चुनाव अलग परिस्थितियों में लड़ने होंगे। इस बार परिस्थितियां 2021 के चुनाव की तुलना में काफी अलग हैं, जिनमें ममता बनर्जी की जीत हुई थी।
सबसे ज्यादा असर उन जिलों में पड़ा है, जो लंबे समय से बंगाल की सत्ता तय करते रहे हैं। इनमें अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र और दक्षिण बंगाल 2011 से तृणमूल कांग्रेस के गढ़ रहे हैं। दूसरी ओर उत्तर 24 परगना, नदिया और उत्तर बंगाल के कुछ हिस्सों में मतुआ-शरणार्थी क्षेत्र में 2019 के बाद भाजपा मजबूत हुई।
हालांकि, इसका राजनीतिक असर हर जगह समान नहीं है। दक्षिण बंगाल में तृणमूल की पकड़ कुछ कमजोर होती दिख रही है, जबकि उत्तर बंगाल और जंगलमहल में भाजपा अब भी मजबूत है। लेकिन भाजपा का सबसे अहम सामाजिक आधार—मतुआ वोट—अब पहले जैसा सुरक्षित नहीं दिख रहा।
तृणमूल कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले जिलों उत्तर और दक्षिण 24 परगना, मुर्शिदाबाद, नदिया, मालदा, हुगली, हावड़ा, उत्तर दिनाजपुर और पूर्व बर्धमान में कुल मिलाकर करीब 66.6 लाख नाम हटाए गए हैं, जो राज्य में हटाए गए नामों का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा है। इन जिलों में 294 में से 178 विधानसभा क्षेत्र आते हैं।
साथ ही, मतुआ बहुल 55 सीट पर भी एसआईआर का बड़ा असर पड़ा है, जिससे भाजपा के भरोसेमंद वोट बैंक में अस्थिरता आई है।
बांग्लादेश सीमा से लगे जिलों में सबसे ज्यादा बदलाव देखने को मिला है, जहां नागरिकता और प्रवासन लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक मुद्दा रहे हैं।
उत्तर 24 परगना (31 सीट) में 12.6 लाख, दक्षिण 24 परगना (33 सीट) में 10.91 लाख, मुर्शिदाबाद (22 सीट) में 7.48 लाख, नदिया (17 सीट) में 4.85 लाख और मालदा (16 सीट) में 4.59 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।
राजनीतिक विश्लेषक बिश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, “तृणमूल कांग्रेस की राज्यव्यापी बढ़त तीन स्तंभों पर टिकी है—अल्पसंख्यक क्षेत्र, महिला मतदाता और उत्तर एवं दक्षिण 24 परगना जिले। अगर इन क्षेत्रों में उसकी बढ़त थोड़ी कम रहती है, तो भाजपा कई सीट पर मुकाबले में आ सकती है।”
मतदाता सूची में लैंगिक संतुलन भी बदला है। पहले प्रति 1000 पुरुषों पर 959 महिला मतदाता थीं, जो अब घटकर 950 रह गई हैं। इससे तृणमूल कांग्रेस के एक और मजबूत आधार—महिला वोट—पर असर पड़ने का संकेत मिलता है।
हालांकि, इस बदलाव का उल्टा असर भी हो सकता है। अल्पसंख्यक बहुल जिलों में इस प्रक्रिया से असुरक्षा की भावना बढ़ी है, जिससे मुस्लिम मतदाता तृणमूल के पक्ष में और ज्यादा एकजुट हो सकते हैं। इससे छोटे दलों जैसे इंडियन सेकुलर फ्रंट (आईएसएफ), आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीनए (आईएमआईएम) को नुकसान हो सकता है।
राजनीतिक विश्लेषक सुमन भट्टाचार्य के अनुसार, “अगर असुरक्षा की भावना से पूरी तरह एकजुटता आती है, तो तृणमूल कांग्रेस नुकसान की भरपाई कर सकती है।’’
भाजपा के लिए सबसे बड़ी चिंता मतुआ शरणार्थी क्षेत्र है, जहां समुदाय के नेताओं का दावा है कि करीब 70 प्रतिशत परिवार एसआईआर से प्रभावित हुए हैं।
करीब 1.3 करोड़ मतदाताओं वाले मतुआ समुदाय का असर कम से कम 55 सीट पर है और 2021 के चुनाव में भाजपा के खाते में आईं 77 सीट में से आधी से ज्यादा इसी क्षेत्र की थीं।
नदिया में सबसे ज्यादा असर पड़ा, जहां जांच के दायरे में आए लगभग 78 प्रतिशत मतदाताओं के नाम हटा दिए गए।
हालांकि, भाजपा को उम्मीद है कि उत्तर बंगाल में उसे कुछ राहत मिल सकती है, जहां उसकी स्थिति मजबूत है और हटाए गए नामों का असर अधिकतर अल्पसंख्यक क्षेत्रों में पड़ा है।
कूचबिहार में 2.42 लाख, जलपाईगुड़ी में 2.01 लाख, दार्जिलिंग में 1.9 लाख और उत्तर दिनाजपुर में 3.63 लाख मतदाता सूची से हटाए गए हैं।
जंगलमहल क्षेत्र में भी भाजपा का मुख्य वोट बैंक अपेक्षाकृत सुरक्षित दिख रहा है। झारग्राम में केवल 55,364, पुरुलिया में 1.91 लाख और बांकुड़ा में 1.43 लाख नाम हटाए गए हैं।
तृणमूल के नेताओं का आरोप है कि इस प्रक्रिया ने अल्पसंख्यकों, महिलाओं और प्रवासी मजदूरों को ज्यादा प्रभावित किया है, जो पार्टी के प्रमुख समर्थक रहे हैं।
सबसे बड़ी अनिश्चितता उन सीट पर है, जहां जीत का अंतर कम था। 120 से अधिक सीट पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या 2021 विधानसभा या 2024 लोकसभा चुनाव में जीत के अंतर से ज्यादा है।
साल 2021 में तृणमूल कांग्रेस ने कम से कम 45 सीट 10,000 से कम अंतर से जीती थीं, जबकि भाजपा ने भी लगभग 20 सीट इसी अंतर से जीती थीं।
भाषा जोहेब सुरभि
सुरभि