नयी दिल्ली, 19 मार्च (भाषा) फिल्म निर्माण को एक उच्च जोखिम वाला व्यवसाय मानते हुए, उच्चतम न्यायालय ने एक फाइनेंसर को पैसा लौटाने में विफल रहने के मामले में बृहस्पतिवार को एक फिल्म निर्माता के खिलाफ आपराधिक धोखाधड़ी मामले को रद्द कर दिया।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि धोखाधड़ी का अपराध तभी बनता है जब धोखा देने की मंशा मौजूद हो।
मद्रास उच्च न्यायालय के एक आदेश को रद्द करते हुए, शीर्ष अदालत ने कहा कि यह साबित करना आवश्यक है कि वादा करते समय व्यक्ति का इरादा कपटपूर्ण या बेईमानी का था।
पीठ ने कहा कि बाद में वादा पूरा न कर पाने मात्र से यह मान लेना उचित नहीं है कि शुरू से ही बेईमानी का इरादा था।
पीठ ने कहा, ‘‘हमारे विचार में, उच्च न्यायालय ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि फिल्म निर्माण एक जोखिम भरा व्यवसाय है। कोई भी निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि फिल्म लाभ कमाएगी या फ्लॉप होगी। यदि कोई व्यक्ति फिल्म में अपने निवेश के बदले लाभ साझा करने के लिए सहमत होता है, तो वह शून्य प्रतिफल की आशंका का भी जोखिम उठाता है।’’
न्यायालय ने कहा कि ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह संकेत मिले कि अपीलकर्ता का शुरू से ही बेईमानी का इरादा था।
मामले के मुताबिक, वी. गणेशन एक फिल्म का निर्माण कर रहे थे और पैसों की कमी होने पर उन्होंने एस. सेंथिल बाबू (शिकायतकर्ता) से इस आश्वासन पर पैसे उधार मांगे कि उन्हें मुनाफे में 30 प्रतिशत हिस्सा मिलेगा।
बाद में, मुनाफे में अतिरिक्त 17 प्रतिशत हिस्से के वादे पर और पैसे उधार दिए गए। अंततः, गणेशन ने शिकायतकर्ता को मूलधन की वापसी के लिए 24 लाख रुपये के दो चेक जारी किए, जो खाते में अपर्याप्त धनराशि के कारण बाउंस हो गए।
इसी आधार पर, यह आरोप लगाया गया कि गणेशन ने शिकायतकर्ता को धोखा दिया है।
भाषा शफीक सुरेश
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