झारखंड के पूर्व नौकरशाहों ने छात्रों की मदद के लिए एआई आधारित ऐप की शुरुआत की
झारखंड के पूर्व नौकरशाहों ने छात्रों की मदद के लिए एआई आधारित ऐप की शुरुआत की
रांची, चार अगस्त (भाषा)झारखंड के तीन सेवानिवृत्त नौकरशाहों ने कई दशकों तक लोक नीति को आकार देने और विद्यालयों को बेहतर बनाने व स्वास्थ्य संस्थानों को मजबूत करने की दिशा में काम करने के बाद अब हर बच्चे तक अच्छी शिक्षा पहुंचाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई)-आधारित मोबाइल एप्लिकेशन की शुरुआत की है।
पूर्व स्वास्थ्य सचिव एवं वर्तमान में अमेरिका के साउथ फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर डॉ. शिवेंदु, राज्य की पूर्व शिक्षा सचिव मृदुला सिन्हा और पूर्व मुख्य सचिव सुधीर त्रिपाठी ने सरकारी सेवा से अवकाश प्राप्त करने के बाद भी जनसेवा के अपने मिशन को जारी रखा।
नौकरशाहों ने कहा कि जनसेवा के मिशन का नतीजा ‘प्रीप्जी. एआई’ है, जो केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) से सबंद्ध विद्यालयों के छठीं से 12वीं कक्षा के छात्रों के लिए एआई आधारित व्यक्तिपरक अध्ययन मंच है। उन्होंने बताया कि इसका उद्देश्य भारत की शिक्षा व्यवस्था की दशकों पुरानी समस्या को हल करना है , यानी सुविधा और क्षमता के बीच के अंतर को कम करना।
पूर्व नौकरशाह डॉ. शिवेंदु ने कहा कि यह ऐप हर बच्चे तक अच्छी शिक्षा पहुंचाएगा, चाहे वे कहीं भी रहते हों या उनके माता-पिता की कमाई कितनी भी हो।
उन्हें झारखंड की स्वास्थ्य अवसंरचना को बेहतर बनाने का श्रेय दिया जाता है।
उन्होंने कहा, ‘‘इस मंच को इस बात को ध्यान में रखकर बनाया गया है कि दूर-दराज के गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को भी वैसा ही अच्छा शैक्षणिक मार्गदर्शन मिल सके, जैसा बड़े शहर के किसी शीर्ष निजी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे को मिलता है।’’
डॉ.शिवेंदु ने कहा कि यह एक मुफ़्त प्राथमिक संस्करण प्रदान करता है, जिससे व्यक्तिपरक एआई आधारित पढ़ाई उन परिवारों के लिए भी सस्ती हो जाती है जो निजी ट्यूशन पर हर महीने हज़ारों रुपये खर्च नहीं कर सकते।
उन्होंने बताया कि इस एप्लिकेशन का उन्नत संस्करण सात या आठ रुपये की मामूली कीमत पर उपलब्ध हैं, क्योंकि संस्थापकों का मानना है कि अगर इसे मुफ़्त में दिया जाए, तो लोग शायद इस उत्पाद की अहमियत न समझें।
ऐप के संस्थापकों का कहना है कि यह कोई स्टार्ट-अप उद्यम नहीं है, बल्कि उस जन-सेवा का विस्तार है जिसे उन्होंने अपने पूरे करियर के दौरान किया है।
डॉ.शिवेंदु ने कहा, ‘‘ हमने समाज में विभाजन देखा है। हमने देखा है कि बहुत काबिल होने के बावजूद गरीब बच्चे संघर्ष करते हैं। ‘प्रीप्जी. एआई’ उस समाज को कुछ वापस देने की हमारी कोशिश है, जिसने हमें इतना कुछ दिया है।’’
डॉ. शिवेंदु की पत्नी और पूर्व नौकरशाह मृदुला सिन्हा ने कहा,‘‘हमारा यह यकीन गांवों में घूमने, छात्रों, शिक्षकों और अभिभावकों से बातचीत करने और खुद यह देखने से बना है कि कैसे शिक्षा में असमानता अक्सर आर्थिक असमानता को दर्शाती है।’’
सिन्हा ने कहा कि उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में कई सुधार किए थे।
उन्होंने कहा, ‘‘जब मैं झारखंड में शिक्षा सचिव थी, तो मैंने अक्सर छात्रों के सपनों और उनकी असल उपलब्धियों के बीच बड़ा अंतर देखा। यह देखकर दुख होता था… मुझे यह देखकर बहुत खुशी हो रही है कि एक छोटी सी कोशिश से भी बदलाव आने लगा है।’’
सिन्हा ने याद किया कि वह ऐसे अभिभावकों से मिलीं,जो मानते थे कि बेहतर भविष्य के लिए शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है, लेकिन वे निजी ट्यूशन का खर्च नहीं वहन कर सकते थे।
उन्होंने कहा, ‘‘हमने सरकारी विद्यालयों का दौरा किया, जहां शिक्षक मुश्किल हालात में काम करते थे और उनके पास हर बच्चे पर अलग से ध्यान देने के लिए बहुत कम समय होता था। प्रशासनिक सेवा छोड़ने के काफी समय बाद भी वे अनुभव हमारे साथ बने रहे।’’
सिन्हा ने कहा कि सरकारी सेवा की वजह से उन्हें ज़मीनी स्तर पर लोगों की आकांक्षाओं को समझने का मौका मिला और लगभग हर आकांक्षा के केंद्र में शिक्षा ही थी।
प्रशासनिक सेवा से अवकाश प्राप्त करने के बाद डॉ. शिवेंदु ने एक नए रास्ते पर कदम रखा। वह शिक्षा के क्षेत्र में आने के बाद साउथ फ़्लोरिडा यूनिवर्सिटी में एसोसिएट प्रोफेसर बने, जहां उनका अनुसंधान शिक्षा नवोन्मेष और शिक्षण विज्ञान पर केंद्रित रहा है।
उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी से सीखने की प्रक्रिया को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, इस पर कई सालों तक अनुसंधान करने के बाद उनके मन में एक अलग सवाल आया – सवाल यह नहीं था कि कक्षा को डिजिटल कैसे बनाया जाए, बल्कि यह था कि प्रौद्योगिकी प्रत्येक छात्र की सीखने की विशेष जरूरतों को कैसे समझ सकती है।
डॉ.शिवेंदु ने कहा कि यह मंच पहले से रिकॉर्ड किए गए व्याख्यान के पुस्तकालय की तरह काम करने के बजाय, यह विश्लेषण करता है कि प्रत्येक छात्र कैसे सीखता है, उसकी कमियों की पहचान करता है और उन्हें तब तक कदम-दर-कदम मार्गदर्शन करता है जब तक वे किसी विषय में माहिर न हो जाएं।
उन्होंने कहा, ‘‘जब छात्र किसी विषय पर अटक जाते हैं, तो उन्हें बस जवाब दे देने से उन्हें सीखने में मदद नहीं मिलती।’’
डॉ. शिवेंदु ने कहा कि इसका उद्देश्य उन्हें हर कदम के पीछे की वजह समझने में मदद करना है, ताकि वे खुद से सीखने वाले बन सकें।
उन्होंने कहा कि भारत की भाषाई विविधता को ध्यान में रखते हुए, गणित और विज्ञान के पाठ हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी उपलब्ध हैं, जिससे छात्र उस भाषा में सीख सकते हैं जिसे वे सबसे अच्छी तरह समझते हैं।
झारखंड के पूर्व मुख्य सचिव सुधीर त्रिपाठी, जो इस पहल में वरिष्ठ उपाध्यक्ष (संस्थागत संबंध) के तौर पर शामिल हुए हैं। उनका मानना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को शिक्षकों की जगह लेने के बजाय उन्हें सशक्त बनाना चाहिए।
त्रिपाठी ने कहा, ‘‘कक्षाएं अहम हैं। प्रौद्योगिकी को शिक्षकों की मदद करनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि स्कूल के समय के बाद भी छात्रों को उनकी जरूरतों के हिसाब से पढ़ाई में मदद मिलती रहे।’’
यह पहल ऐसे समय में शुरू की गई है जब राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (एनएएस), वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट (असर) और ‘परख’ जैसे लगातार हुए राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में सीखने में लगातार खामियों(खासकर गणित और विज्ञान में) की बात सामने आई है, और ग्रामीण तथा आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों के लिए ये चुनौतियां और भी गंभीर हो गई हैं।
भाषा धीरज नरेश
नरेश

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