‘जेन-अल्फा’ पिछली पीढ़ियों से ज्यादा समझदार, इसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए : अभाविप

‘जेन-अल्फा’ पिछली पीढ़ियों से ज्यादा समझदार, इसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए : अभाविप

‘जेन-अल्फा’ पिछली पीढ़ियों से ज्यादा समझदार, इसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए : अभाविप
Modified Date: September 24, 2026 / 06:58 pm IST
Published Date: September 24, 2026 6:58 pm IST

(कोमल शर्मा)

नयी दिल्ली, 24 सितंबर (भाषा) अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) के राष्ट्रीय महासचिव वीरेंद्र सिंह सोलंकी का कहना है कि ‘जेन-अल्फा’ पिछली पीढ़ियों के मुकाबले ज्यादा समझदार है और उसे राजनीति में उलझाने के बजाय देश की तरक्की के लिए काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

‘जेन-अल्फा’ से आशय उन लोगों से है, जिनका जन्म 2010 से 2024 के बीच हुआ।

सोलंकी ने छात्रों से सोशल मीडिया पर मौजूद ऐसी गुमराह करने वाली सामग्री से सावधान रहने को भी कहा, जो देश की “सामाजिक अखंडता और एकता’ को प्रभावित कर सकती हैं।

उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ के साथ साक्षात्कार में कहा कि शिक्षण संस्थानों का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए और छात्रों से जुड़े मुद्दों को सही तरीके से उठाया तथा सुलझाया जाना चाहिए।

सोलंकी ने कहा, “जेन-अल्फा अभी स्कूल में पढ़ रही है, जिसमें 10वीं या 12वीं कक्षा तक के छात्र शामिल हैं। यह पीढ़ी बहुत समझदार है। अगर आप ‘जेन-अल्फा’ की तुलना पिछली पीढ़ियों से करें, तो उसे ज्यादा स्मार्ट और प्रौद्योगिकी की बेहतर समझ वाला पाएंगे।”

उन्होंने कहा, “जेन-अल्फा कोई भी जानकारी तुरंत खोज निकालती है। वह चीजों को समझती है। इसलिए, मुझे नहीं लगता कि उसे राजनीति में उलझाने की जरूरत है और न ही हमें ऐसा करना चाहिए।”

हालांकि, सोलंकी ने कहा कि ‘जेन-अल्फा’ को देश और उसके भविष्य के बारे में सोचने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, “जब ये छात्र करियर की राह पर आगे बढ़ें, तो उन्हें न सिर्फ अपने, बल्कि देश के भविष्य के बारे में भी सोचना चाहिए। जब ​​किसी देश के युवा इस दिशा में सोचना शुरू करते हैं, तो मुझे लगता है कि वे देश की तरक्की में योगदान देंगे।”

छात्र राजनीति पर सोशल मीडिया के प्रभाव के बारे में पूछे जाने पर सोलंकी ने कहा कि इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे मंच छात्रों की सोच पर असर डालते हैं और किसी खास घटना पर उनमें भावनात्मक प्रतिक्रिया जगा सकते हैं।

उन्होंने कहा, “इसका असर तो होता है। लेकिन मुझे लगता है कि आज के छात्रों को समझदारी के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है। उन्हें यह परखना चाहिए कि कौन-सी सामग्री फायदेमंद है और किस चीज का समाज पर बुरा असर पड़ सकता है।”

सोलंकी ने कहा कि युवाओं को समझना चाहिए कि कुछ सामग्री देश की “सामाजिक अखंडता और एकता” पर कैसे असर डाल सकती है।

उन्होंने कहा, “अगर भारत के युवाओं में यह समझ विकसित हो जाए, तो मुझे लगता है कि कोई भी ताकत उन्हें गुमराह नहीं कर पाएगी।”

राजनीति और छात्र राजनीति में ‘जेन-जी’ की भूमिका पर सोलंकी ने कहा कि कुछ युवाओं के आचरण से पूरी पीढ़ी को नहीं आंका जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, “आप जंतर-मंतर पर कुछ छात्रों के आचरण, उनकी ओर से इस्तेमाल किए गए अपशब्दों या बनाई गई ‘रील्स’ के आधार पर पूरे देश की “जेन-जी’ को परिभाषित नहीं कर सकते।”

सोलंकी ने दावा किया कि ‘जेन-जी’ मोटे तौर पर ‘राष्ट्र प्रथम’ की अवधारणा में यकीन करती है, वह चाहती है कि भारत तरक्की करे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत ताकत बनकर उभरे।

नीट-यूजी विवाद को लेकर हुए विरोध-प्रदर्शनों के बारे में सोलंकी ने कहा कि छात्रों की शिकायतें जायज थीं, लेकिन बाद में राजनीतिक दलों और बाहरी लोगों ने इस आंदोलन को “सियासी एजेंडे” की ओर मोड़ दिया।

उन्होंने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी (आप), समाजवादी पार्टी (सपा) की युवा शाखा और कांग्रेस के छात्र संगठन ‘नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया’ (एनएसयूआई) से जुड़े लोग इन विरोध-प्रदर्शनों में शामिल थे और बाहरी लोगों ने भी इनमें हिस्सा लिया तथा अव्यवस्था फैलाई।

भाषा पारुल पवनेश

पवनेश


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