एम्स में उपचार के बाद मिर्गी से पीड़ित बच्ची को मिली दौरों से मुक्ति
एम्स में उपचार के बाद मिर्गी से पीड़ित बच्ची को मिली दौरों से मुक्ति
(पायल बनर्जी)
नयी दिल्ली, नौ अगस्त (भाषा) केरल के एक दूरदराज गांव की 12 वर्षीय बच्ची पिछले दो साल से सामान्य जीवन जी रही है, जो बचपन में दौरे पड़ने के बाद करीब एक दशक तक मिर्गी की गंभीर समस्या से परेशान थी।
दिल्ली स्थित एम्स में कई चरण के उपचार के बाद उसने अपनी रोजमर्रा की सामान्य गतिविधियां फिर से शुरू कर दी हैं।
बच्ची कई मिर्गी रोधी दवाएं लेने के बावजूद हर दिन एक से दो बार दौरे झेलती थी। पहले उसकी एक नयी रोबोटिक मस्तिष्क चिकित्सा की गई और उसके बाद एंडोवैस्कुलर उपचार किया गया, जिसकी वजह से वह दो बड़ी मस्तिष्क सर्जरी से बच गई।
एम्स के चिकित्सकों ने इस मामले को इस बात का उदाहरण बताया कि किस तरह कई विशेषज्ञों की संयुक्त देखभाल और आधुनिक सर्जिकल तकनीकें उन बच्चों के इलाज के परिणामों को भी बदल सकती हैं, जिन्हें सामान्य मस्तिष्क सर्जरी के लिए बहुत अधिक जोखिम वाला माना जाता है।
बच्ची की मां अपनी बेटी के इलाज की तलाश में केरल के कई अस्पतालों के चक्कर लगाती रहीं। बेटी को नौ महीने की उम्र में पड़े भीषण दौरे के बाद मिर्गी की समस्या शुरू हो गई थी।
केरल के मुख्यमंत्री राहत कोष से मिली आर्थिक सहायता के बाद परिवार मार्च 2024 में इलाज के लिए दिल्ली स्थित एम्स पहुंच सका।
दिल्ली एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग की प्रमुख डॉ. मंजरी त्रिपाठी ने बताया कि बच्ची जन्म से ही हृदय रोग और हृदय की मांसपेशियों के फैलने (डाइलेटेड कार्डियोमायोपैथी) की समस्या से पीड़ित थी।
उन्होंने कहा, ‘स्ट्रोक के कारण उसके मस्तिष्क का दायां हिस्सा स्थायी रूप से खराब हो गया था और दो साल की उम्र तक उसे बार-बार दौरे पड़ने लगे, जिससे उसके जीवन पर गंभीर असर पड़ा।’
विस्तृत जांच के बाद एम्स की मिर्गी चिकित्सा टीम ने निष्कर्ष निकाला कि दौरे को नियंत्रित करने का सबसे अच्छा तरीका सर्जरी हो सकती है।
त्रिपाठी ने कहा कि बच्ची को दवा से नियंत्रित न होने वाली मिर्गी थी और लंबे समय तक इलाज के बावजूद उसे गंभीर दौरे पड़ते रहे।
उन्होंने कहा, ‘वर्षो तक उसे हर दिन कई दौरे पड़ते थे, जिसका असर उसके बचपन पर पड़ा। पूरी जांच के बाद हमें पता चला कि सर्जरी ही उसके लिए एकमात्र वास्तविक विकल्प है। उसे अब दौरे से मुक्त देखकर और सामान्य दैनिक गतिविधियां करते हुए देखना पूरी टीम के लिए बेहद संतोषजनक है।’
एम्स दिल्ली के न्यूरोसर्जरी और गामा नाइफ विभाग के प्रमुख डॉ. पी. शरत चंद्रा ने कहा कि आमतौर पर ऐसे मरीजों में बड़े चीरे वाली हेमिस्फेरोटॉमी सर्जरी की जाती है, जिसमें खोपड़ी को काफी बड़ा खोलना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि बच्ची के गंभीर हृदय रोग के कारण सामान्य सर्जरी का जोखिम बहुत अधिक था।
इसके बजाय न्यूरोसर्जरी टीम ने रोबोटिक थर्मोकोएगुलेटिव हेमिस्फेरोटॉमी (आरओटीसीएच) प्रक्रिया का विकल्प चुना।
इस प्रक्रिया में सर्जन छोटे रास्तों के माध्यम से मस्तिष्क के खराब हिस्से को अलग कर देते हैं और इसमें खून का नुकसान भी बहुत कम होता है।
चंद्रा ने कहा, ‘उसकी हृदय संबंधी स्थिति के कारण सामान्य सर्जरी बहुत जोखिम भरी थी। आरओटीसीएच में हमें कम चीरे वाली तकनीक से यह प्रक्रिया करने में मदद मिली और बड़े चीरे वाली सर्जरी की जरूरत नहीं हुई। यह उन मरीजों के लिए महत्वपूर्ण है जो सामान्य सर्जरी को सहन नहीं कर सकते।’
भाषा जोहेब नरेश
नरेश

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