गोवा नाइटक्लब अग्निकांड: उच्च न्यायालय ने तीन आरोपियों की जमानत रद्द की

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गोवा नाइटक्लब अग्निकांड: उच्च न्यायालय ने तीन आरोपियों की जमानत रद्द की

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  • Publish Date - August 19, 2026 / 09:42 PM IST,
    Updated On - August 19, 2026 / 09:42 PM IST

पणजी, 19 अगस्त (भाषा) मुंबई उच्च न्यायालय ने गोवा नाइटक्लब अग्निकांड मामले में तीन आरोपियों को दी गई जमानत यह कहते हुए रद्द कर दी अधीनस्थ अदालत जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री पर ठीक से विचार नहीं कर पाई और उसकी यह टिप्पणी गलत थी कि यह अपराध हत्या या डकैती जितना जघन्य नहीं था।

उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया संकेत मिलता है कि रेस्तरां बिना लाइसेंस के संचालित किया जा रहा था और उसका ढांचा अनधिकृत था। साथ ही, आरोपी और उसके साझेदार कथित तौर पर पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना परिसर में आतिशबाजी करने के जोखिमों से परिचित थे।

मुंबई उच्च न्यायालय की गोवा पीठ की न्यायमूर्ति डॉ. नीला गोखले ने अधीनस्थ अदालत द्वारा आरोपियों को दी गई जमानत को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 18 अगस्त को यह आदेश पारित किया। उन्होंने तीनों आरोपियों को अधीनस्थ अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया।

छह दिसंबर, 2025 को अर्पोरा स्थित ‘बर्च बाय रोमियो लेन’ नाइटक्लब में लगी भीषण आग में 25 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 50 अन्य घायल हुए थे।

सौरभ लूथरा और गौरव लूथरा भाई हैं। वे अपने व्यावसायिक साझेदार अजय गुप्ता के साथ ‘मैसर्स बीइंग जीएस हॉस्पिटैलिटी अर्पोरा एलएलपी’ में साझेदार थे, जो इस नाइटक्लब का संचालन करती थी। तीनों आरोपियों को इस साल अप्रैल में अधीनस्थ अदालत ने जमानत दी थी।

अपने आदेश में उच्च न्यायालय ने तीनों आरोपियों को दो सप्ताह के भीतर सत्र अदालत के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। हालांकि, अदालत ने उन्हें आत्मसमर्पण के बाद नए सिरे से जमानत याचिका दायर करने की अनुमति दी।

अदालत राज्य सरकार द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोपियों को जमानत देने के सत्र अदालत के आदेश को चुनौती दी गई थी।

राज्य सरकार ने दलील दी कि सत्र अदालत अपराध की गंभीरता को समझ नहीं पाई। राज्य के अनुसार, कथित आपराधिक लापरवाही, लापरवाह आचरण और वैधानिक अग्नि सुरक्षा मानकों के उल्लंघन के कारण 25 लोगों की मौत हुई।

उच्च न्यायालय ने कहा कि जमानत के लिए दायर याचिका आरोपियों की दूसरी याचिका थी और उनकी पहली याचिका महज दो महीने पहले खारिज की गई थी।

अदालत ने कहा कि सत्र अदालत ने जमानत देने को उचित ठहराने के लिए आरोपपत्र दाखिल होने के अलावा किसी अन्य बदली परिस्थिति का उल्लेख नहीं किया था।

उच्च न्यायालय ने इस निष्कर्ष को भी खारिज कर दिया कि आरोपी के फरार होने का कोई खतरा नहीं है। अदालत ने कहा कि जिस दिन प्राथमिकी दर्ज हुई, उसी दिन आरोपी देश छोड़कर फरार हो गया था और बाद में उसे भगोड़ा घोषित किया गया।

अदालत ने कहा कि आरोपपत्र दाखिल होने से आरोपों की गंभीरता कम नहीं हो जाती और न ही इससे आरोपी को जमानत पाने का कोई अधिकार मिल जाता है।

उच्च न्यायालय ने कहा कि सत्र अदालत की यह टिप्पणी गलत थी कि अपराध हत्या या डकैती जितना जघन्य नहीं था। उसने इस बात पर बल दिया कि कथित अपराध की गंभीरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भाषा खारी वैभव

वैभव