ग्रेट निकोबार से जुड़ी चिंताओं से बेपरवाह सरकार निजी क्षेत्र को इसमें शामिल कर रही है: कांग्रेस

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ग्रेट निकोबार से जुड़ी चिंताओं से बेपरवाह सरकार निजी क्षेत्र को इसमें शामिल कर रही है: कांग्रेस

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  • Publish Date - January 30, 2026 / 01:06 PM IST,
    Updated On - January 30, 2026 / 01:06 PM IST

नयी दिल्ली, 30 जनवरी (भाषा) कांग्रेस ने ग्रेट निकोबार परियोजना को लेकर शुक्रवार को केंद्र सरकार पर फिर निशाना साधा और दावा किया कि इससे जुड़ी चिंताओं की अनदेखी कर अब इसमें निजी क्षेत्र के लोगों को शामिल किया जा रहा है।

पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने यह आरोप भी लगाया कि एक बड़े कॉरपोरेट समूह के हित में यह सब किया जा रहा है।

पूर्व पर्यावरण मंत्री रमेश ने ‘एक्स’ पर पोस्ट किया, ‘ग्रेट निकोबार परियोजना को मोदी सरकार ज़बरदस्ती आगे बढ़ा रही है, जबकि इसके गंभीर पारिस्थितिकी (पर्यावरणीय) दुष्प्रभावों के ठोस प्रमाण लगातार सामने आ रहे हैं। इस परियोजना ने व्यापक चिंता पैदा की है। जिस तरीके से पर्यावरण तथा अन्य क़ानूनों की अनदेखी करके इसे आगे बढ़ाया जा रहा है, उसके ख़िलाफ़ दायर याचिकाएं कलकत्ता उच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण में लंबित हैं।’

उनका कहना है, ‘अब मोदी सरकार की इस जिद का एक अहम कारण भी स्पष्ट हो गया है। केंद्रीय पोत परिवहन, नौवहन और जलमार्ग मंत्रालय ने हाल ही में प्रस्ताव दिया है कि ग्रेट निकोबार परियोजना के एक अनिवार्य हिस्से, गलाथिया बे अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल को सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल के तहत विकसित किया जाए। ‘

उन्होंने दावा किया कि इस सिफ़ारिश के पीछे सरकार किस निजी कॉरपोरेट समूह को ध्यान में रखे हुए है, इसमें कोई रहस्य नहीं है।

रमेश ने कहा, ‘ यह वही समूह है जो देश में पहले से ही 13 बंदरगाहों और टर्मिनलों का मालिक और संचालक है और कॉरपोरेट दुनिया में सबसे बड़ा प्रभावशाली खिलाड़ी माना जाता है , वह भी प्रधानमंत्री के आशीर्वाद के साथ।’

उनका कहना है, ‘यह भी गौर करने लायक है कि मोदी सरकार ऐसे समय में निजी क्षेत्र के लोगों को इस परियोजना में लाने की कोशिश कर रही है, जब वह राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर परियोजना से जुड़ी अहम जानकारियां आम जनता के साथ साझा करने से इनकार कर रही है।’

कांग्रेस नेता ने कहा कि इससे साफ़ होता है कि जनता के प्रति पारदर्शिता की कमी मोदी सरकार के लिए सुरक्षा का नहीं, बल्कि राजनीतिक सुविधा का मामला है।

भाषा हक खारी मनीषा

मनीषा