वंदे मातरम् संबंधी आदेश पर पुनर्विचार करे सरकार : राज्यपाल ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री को लिखा पत्र

वंदे मातरम् संबंधी आदेश पर पुनर्विचार करे सरकार : राज्यपाल ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री को लिखा पत्र

वंदे मातरम् संबंधी आदेश पर पुनर्विचार करे सरकार : राज्यपाल ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री को लिखा पत्र
Modified Date: September 22, 2026 / 03:34 pm IST
Published Date: September 22, 2026 3:34 pm IST

बेंगलुरु, 22 सितंबर (भाषा) कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार को पत्र लिखकर राज्य सरकार के उस फैसले पर फिर से विचार करने को कहा है जिसके तहत सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के गायन को दो अंतरों तक सीमित कर दिया गया है।

कांग्रेस सरकार ने हाल ही में आदेश दिया था कि उसके कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ के केवल पहले दो अंतरे ही गाए जाएं, सिवाय उन कार्यक्रमों के जिनमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या राज्यपाल शामिल हों।

मुख्यमंत्री को 22 सितंबर को लिखे एक पत्र में, राज्यपाल ने कहा कि आठ सितंबर, 2026 का सरकारी आदेश केंद्र द्वारा जारी दिशानिर्देशों के खिलाफ लगता है और ‘राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2026’ के संदर्भ में संवैधानिक और कानूनी सवाल खड़े करता है।

उन्होंने राष्ट्रीय गीत और राष्ट्रगान से संबंधित गृह मंत्रालय के आदेशों का हवाला दिया और कहा कि केंद्र ने वंदे मातरम् के गायन के लिए एक आधिकारिक संस्करण निर्धारित किया था।

पत्र में कहा गया कि केंद्रीय निर्देश, विशेष रूप से राष्ट्रीय गीत के सामूहिक गायन से संबंधित निर्देश, किसी राज्य सरकार के लिए उसके समारोहों में कोई अलग या संक्षिप्त संस्करण निर्धारित करने की “कोई गुंजाइश नहीं छोड़ते”।

गहलोत ने राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में 2026 के संशोधन का उल्लेख करते हुए कहा कि संसद ने धारा 3 के तहत वैधानिक संरक्षण का विस्तार राष्ट्रीय गीत तक कर दिया था।

पत्र के अनुसार, संशोधित प्रावधानों में राष्ट्रीय गीत गाने से जानबूझकर रोकना और ऐसे गीत गा रही सभा में जानबूझकर व्यवधान डालना शामिल है।

उन्होंने कहा, “इस प्रकार, संसद ने अब स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय गीत को राष्ट्रीय सम्मान के वैधानिक ढांचे के अंतर्गत ला दिया है। इसलिए यह वांछनीय है कि राष्ट्रीय गीत के गायन से संबंधित राज्य की कार्यपालिका की कार्रवाई को किसी भिन्न राज्य-विशिष्ट संस्करण को निर्धारित करने के बजाय केंद्रीय वैधानिक और कार्यकारी ढांचे के साथ सावधानीपूर्वक सामंजस्य स्थापित किया जाए।”

राज्यपाल ने संविधान के अनुच्छेद 162, 256 और 257(1) का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार द्वारा ऐसा प्रोटोकॉल अपनाने से पहले संघ और राज्यों के बीच कार्यकारी शक्तियों के वितरण पर विचार किया जाना आवश्यक था।

उन्होंने कहा, “तदनुसार, जहां केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय गीत के गायन के लिए एक आधिकारिक संस्करण और प्रोटोकॉल निर्धारित किया है, वहां राज्य सरकार द्वारा एक भिन्न संस्करण निर्धारित करने वाला आदेश संघ और राज्य की कार्यपालिका के अधिकार-क्षेत्रों से संबंधित एक टाले जा सकने वाले संवैधानिक प्रश्न को जन्म दे सकता है।”

राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में हालिया संशोधन को महत्वपूर्ण बताते हुए राज्यपाल ने कहा कि संसद ने सोच समझ कर वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में वैधानिक संरक्षण प्रदान किया था।

गहलोत ने राज्य सरकार को सलाह दी कि वह यह जांच करे कि क्या गायन को दो अंतरों तक सीमित करने का आदेश 2026 के संशोधन, गृह मंत्रालय के निर्देशों, संबंधित संवैधानिक प्रावधानों और केंद्र तथा राज्यों के बीच विधायी एवं कार्यकारी शक्तियों के वितरण के अनुरूप लगातार बनाए रखा जा सकता है, साथ ही राष्ट्रीय प्रतीकों से संबंधित राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित प्रोटोकॉल के पालन में एकरूपता और गरिमा बनाए रखने की आवश्यकता को भी ध्यान में रखा जाए।

पत्र में राष्ट्रीय प्रतीकों से संबंधित उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उनकी कानूनी स्थिति पर वैधानिक ढांचे और संवैधानिक स्वतंत्रताओं के संदर्भ में विचार किया जाना था।

गहलोत ने कहा, “इसलिए, उपरोक्त के मद्देनजर, मैं राज्य सरकार को 8 सितंबर 2026 के सरकारी आदेश पर पुनर्विचार करने और राज्य सरकार के कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत के गायन के संबंध में केंद्र सरकार के प्रचलित निर्देशों का पालन करने की सलाह देता हूं,”

राज्यपाल ने यह आशा व्यक्त की कि इस मुद्दे पर “संवैधानिक मर्यादा, राष्ट्रीय प्रोटोकॉल में एकरूपता और भारत के राष्ट्रीय गीत के प्रति उचित सम्मान” के हित में विचार किया जाएगा।

भाषा

प्रशांत नरेश

नरेश


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