नयी दिल्ली, 13 मार्च (भाषा) तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने शुक्रवार को कटाक्ष करते हुए कहा कि यह सरकार अच्छे स्लोगन बनाने में सभी देशों को पीछे छोड़ चुकी है, लेकिन हकीकत बिल्कुल अलग है क्योंकि यह ठोस परिणाम नहीं दे सकी है।
ओ’ब्रायन ने राज्यसभा में शून्यकाल के दौरान कहा कि बड़े-बड़े स्लोगन बनाने के बावजूद भारत बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। उन्होंने कहा कि ऐसा ही वर्तमान पश्चिम एशिया संकट के समय हुआ जब देश को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के लिए आपातकालीन उपाय करने पड़े।
उन्होंने कहा, “‘मेक इन इंडिया’ जैसे शानदार स्लोगन बनाने के बावजूद, और देश के निर्माण शक्ति बनने की इच्छा रखने के बावजूद, कुल सकल जीवीए (ग्रॉस वैल्यू एडेड) में विनिर्माण का हिस्सा पिछले 10 वर्षों में केवल 0.3 प्रतिशत बढ़ा है। निर्यात की स्थिति भी यही है।”
जीवीए एक आर्थिक संकेतक है जो उत्पादक के दृष्टिकोण से उत्पादन प्रक्रिया में जोड़े गए वास्तविक मूल्य को दर्शाता है।
उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति पर तंज करते हुए कहा, “हम भारत में शेर हैं। हम भारत में बाघ हैं। कृपया, अप्रासंगिक बातें सुनना बंद करें और अप्रासंगिक ‘डोनाल्ड डक’ की बातों से मार्गदर्शन न लें।”
तृणमूल सांसद ने यह सुनिश्चित करने के लिए सभापति सी पी राधाकृष्णन की सराहना की कि शून्यकाल के दौरान लोक महत्व से जुड़े अधिक से अधिक मुद्दे सदन में उठाए जाएं। उन्होंने कहा ‘‘इसका कुछ श्रेय विपक्ष को भी जाता है।’’
इस पर सभापति राधाकृष्णन ने हंसते हुए कहा, “इसका सारा श्रेय आप ले सकते हैं।”
ओ’ब्रायन ने कहा, “मैं इस सरकार को भी बधाई देना चाहता हूं। दुनिया में 190 देश हैं, लेकिन इस सरकार से बेहतर स्लोगन किसी ने नहीं बनाए। और जहां तारीफ की जरूरत है, वहां तारीफ करना चाहिए…।”
उन्होंने आगे कहा, “स्लोगन शानदार हैं, लेकिन हकीकत क्या है? एक ऐसा देश जो निर्माण शक्ति बनने का लक्ष्य रखता है, उसे बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील नहीं होना चाहिए। पश्चिम एशिया संघर्ष को देखें, कच्चे तेल की कीमतें 25 प्रतिशत बढ़ गई हैं। आत्मनिर्भर बनने के लक्ष्य में हमें एलपीजी उत्पादन बढ़ाने के लिए आपात उपाय करने पड़ रहे हैं।”
ओ’ब्रायन ने कहा कि जनवरी 2014 में दिल्ली में एलपीजी सिलेंडर की कीमत 420 रुपये थी, जो अब 914 रुपये हो गई है।
उन्होंने कहा, “एलपीजी की ऊंची कीमतों का मतलब है कि हम पारंपरिक लकड़ी और चूल्हे की ओर लौट रहे हैं, और प्रधानमंत्री के लाखों भाषण में एलपीजी का जिक्र हो सकता है।”
उन्होंने कहा, “‘मेक इन इंडिया’ शानदार स्लोगन है, लेकिन कुल सकल जीवीए में विनिर्माण का हिस्सा कितना बढ़ा? पिछले 10 सालों में केवल 0.3 प्रतिशत। विनिर्माण और निर्यात की वृद्धि भी कम ही रही है।”
भाषा मनीषा वैभव
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