नयी दिल्ली, 23 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने तीन साल की बच्ची से दुष्कर्म मामले में गुरुग्राम पुलिस और मुकदमे की सुनवाई कर रहे मजिस्ट्रेट के ‘‘असंवेदनशील’’ रवैये पर सोमवार को सवाल उठाया।
शीर्ष अदालत ने इसी के साथ गुरुग्राम के पुलिस आयुक्त और जांच अधिकारी को कथित भयावह अपराध से संबंधित सभी जांच रिकॉर्ड के साथ 25 मार्च को अपने समक्ष पेश होने का निर्देश दिया।
न्यायालय ने पीड़िता के पिता के उस हलफनामे को भी गुरुग्राम के जिला न्यायाधीश के साथ सीलबंद लिफाफे में साझा करने का निर्देश दिया, जिसमें न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपियों की उपस्थिति में बच्ची से पूछताछ करने के दौरान ‘‘असंवेदनशील’’ रुख अपनाने का जिक्र किया गया है।
प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने जिला न्यायाधीश से कहा कि वह बच्ची का बयान दर्ज करने वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट से पक्षपात करने के आरोप पर उनका पक्ष जानें और बुधवार को शीर्ष अदालत को अवगत कराएं।
शीर्ष अदालत ने गुरुग्राम में हुई इस घटना की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या विशेष जांच टीम (एसआईटी) से जांच कराने के परिजनों के अनुरोध से जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए हरियाणा सरकार, पुलिस प्रमुख और अन्य को नोटिस जारी किया।
पीठ ने इस मामले में कुछ गिरफ्तारियां करने वाली गुरुग्राम पुलिस को अब तक की गई जांच पर वस्तुस्थिति रिपोर्ट दाखिल करने की भी अनुमति दे दी।
पुलिस ने बताया कि सेक्टर 54 स्थित एक सोसाइटी में दो घरेलू सहायिकाओं और उनके एक पुरुष साथी ने लगभग दो महीने तक तीन वर्षीय बच्ची का कथित तौर पर यौन उत्पीड़न किया।
इसने कहा कि बच्ची के माता-पिता द्वारा लगाए गए आरोपों के बाद चार फरवरी को सेक्टर 53 थाने में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई।
पुलिस के अनुसार, घटना दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 के बीच हुई, लेकिन लड़की द्वारा आपबीती अपनी मां को बताए जाने के बाद ही माता-पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई।
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने मामले की सुनवाई की शुरुआत में कहा कि बच्ची को थाने ले जाया गया और फिर बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के समक्ष पेश किया गया, जहां पुलिसकर्मी वर्दी में थे। उन्होंने कहा कि आरोपियों के सामने ही बच्ची से पूछताछ की गई, जो उससे चार फुट की दूरी पर खड़े थे।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा, ‘‘मजिस्ट्रेट बच्ची से कह रहे थे कि ‘इसको ओथ तो समझ नहीं आएगी’… लेकिन मजिस्ट्रेट तीन साल की बच्ची से कहते हैं कि ‘सच बोलो, सच बोलो’। इससे भी बड़ी बात आरोपी भी वहां मौजूद थे।’’
रोहतगी ने कहा, ‘‘आरोपी बच्ची के निकट नहीं रह सकता।’’ उन्होंने कहा, ‘‘जांच अधिकारी (आईओ) माता-पिता पर आगे परेशानी होने का हवाला देकर मामले को आगे न बढ़ाने का दबाव बना रही थी।’’
उन्होंने कहा कि संबंधित जांच अधिकारी को पूर्व में पॉक्सो मामले में रिश्वत लेने के आरोप में निलंबित किया जा चुका है।
प्रधान न्यायाधीश ने सवाल किया, ‘‘क्या आप तीन साल की सदमे से ग्रस्त बच्ची के साथ इसी तरह व्यवहार करते हैं?’’ उन्होंने कहा, ‘‘आइए, पुलिस के कानूनी ज्ञान की पड़ताल करें।’’
रोहतगी ने कहा, ‘‘यह सब क्या हो रहा है? इसमें उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप की बहुत जरूरत है।’’ उन्होंने साथ कहा कि जांच एजेंसी द्वारा अपनाई जाने वाली पूर्व-परीक्षण प्रक्रियाओं के लिए दिशानिर्देश निर्धारित करने का यह सही समय है।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई के दौरान इस तरह के मामलों से निपटने के लिए दिशानिर्देश मौजूद हैं, लेकिन असली समस्या तब उत्पन्न होती है जब जांच एजेंसी बच्चे के साथ ऐसा व्यवहार तब करती है जब आघात अभी ताजा होता है।
प्रधान न्यायाधीश ने सवाल किया, ‘‘यह किस तरह की असंवेदनशीलता है? आप तीन साल की बच्ची का मामला देख रहे हैं। इसकी जांच कौन कर रहा है?’’
उन्होंने कहा, ‘‘पुलिस किस हद तक असंवेदनशील हो गई है? तथाकथित महानगर में ऐसा हो रहा है! आप सदमे से ग्रस्त बच्चे को देख रहे हैं।’’
न्यायालय ने बच्ची के माता-पिता द्वारा दायर हलफनामे का हवाला देते हुए कहा, ‘‘हलफनामे में दी गई जानकारी से ज्ञात होता है कि अदालत में पीड़ित से जिस तरह से पूछताछ की गई वह बहुत ही परेशान करने वाली है।’’
राज्य सरकार के वकील ने पीठ को बताया कि पहले एक महिला अधिकारी इस मामले की जांच कर रही थी और उसके निलंबित होने के बाद थानाधिकारी (एसएचओ) ने मामला अपने हाथ में ले लिया।
पीठ ने जांच अधिकारी की उस सलाह की आलोचना की जिसमें माता-पिता को मामला आगे न बढ़ाने के लिए कहा गया था। न्यायालय ने कहा, ‘‘यह चौंकाने वाला है! शिकायत दर्ज न होने पर भी पुलिस को मामले की जांच करनी होगी।’’
न्यायालय ने कहा, ‘‘नोटिस जारी करें…हमने अभिकथनों का अध्ययन कर लिया है।’’
आदेश में कहा गया, ‘‘इसके अतिरिक्त, पीड़ित का पक्ष रख रहे रोहतगी ने बच्ची के माता-पिता द्वारा दिया गया हलफनामा प्रस्तुत किया है। हम गुरुग्राम पुलिस आयुक्त और जांच अधिकारियों को निर्देश देते हैं कि वे परसों पूरे रिकॉर्ड के साथ अदालत में उपस्थित रहें।’’
आदेश में अतिरिक्त महाधिवक्ता को हरियाणा पुलिस कैडर में महिला अधिकारियों का विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।
इसमें कहा गया, ‘‘अभिभावक के बयान घटनाओं का एक चिंताजनक क्रम दर्शाते हैं। हम रजिस्ट्री को निर्देश देते हैं कि अभिभावक के हलफनामे को सीलबंद लिफाफे में रखा जाए।’’
आदेश में कहा गया, ‘‘पिता का हलफनामा विशेष संदेशवाहक के माध्यम से हरियाणा के जिला एवं सत्र न्यायाधीश को भेजा जाए। मजिस्ट्रेट की टिप्पणी सीलबंद लिफाफे में इस न्यायालय को भेजी जाए। इस मामले की सुनवाई परसों होगी।’’
रोहतगी ने बताया कि बच्ची को पुलिस थाने से सीडब्ल्यूसी कार्यालय और फिर मजिस्ट्रेट की अदालत से अस्पताल ले जाने की प्रक्रिया के दौरान उसकी मानसिक स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही थी।
उन्होंने आरोप लगाया कि जांच अधिकारियों ने बच्ची द्वारा प्रदर्शित घबराहट के स्पष्ट संकेतों पर ध्यान नहीं दिया और न ही उसकी कम उम्र को देखते हुए कोई विशेष सावधानी बरती।
न्यायालय ने 20 मार्च को मामले की सीबीआई या एसआईटी जांच के अनुरोध वाली याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई थी।
प्रधान न्यायाधीश ने शुरुआत में मामले को उच्च न्यायालय के समक्ष उठाने को कहा था।
भाषा धीरज नेत्रपाल
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