कारोबारी की हत्या की जांच में ‘गंभीर’ चूक, अदालत ने गुरुग्राम पुलिस-डॉक्टर के खिलाफ जांच के आदेश दिए

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कारोबारी की हत्या की जांच में ‘गंभीर’ चूक, अदालत ने गुरुग्राम पुलिस-डॉक्टर के खिलाफ जांच के आदेश दिए

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  • Publish Date - September 29, 2026 / 09:27 PM IST,
    Updated On - September 29, 2026 / 09:27 PM IST

नयी दिल्ली, 29 सितंबर (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने रियल एस्टेट कारोबारी युवराज सिंह मनचंदा के शव से जुड़े मामले में गुरुग्राम पुलिस के अधिकारियों और एक चिकित्सक की संभावित भूमिका की जांच का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि सबूत गायब करने में उनकी संलिप्तता से ‘इनकार नहीं किया जा सकता’।

न्यायिक मजिस्ट्रेट राहुल जैन ने आदेश की एक प्रति गुरुग्राम के पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) को भेजने का निर्देश दिया।

उन्होंने बादशाहपुर थाने के पुलिसकर्मियों की ओर से की गई ‘‘गंभीर’’ प्रक्रियागत चूकों का उल्लेख किया, जिनमें शव से जुड़ी जानकारी को जिपनेट पर अपलोड करने में देरी, पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी नहीं कराना और कार्यकारी मजिस्ट्रेट को इसकी सूचना नहीं देना शामिल है।

अदालत ने कहा, “इस आदेश की एक प्रति गुरुग्राम के डीसीपी को भेजी जाए, जिनके अधिकार क्षेत्र में थाना बादशाहपुर आता है। यह प्रति थाना बादशाहपुर के अधिकारियों की ओर से बरती गई प्रक्रियात्मक खामियों के संबंध में भेजी जाए, जिनमें जिपनेट पर जानकारी अपलोड करने में देरी, पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी नहीं कराना और कार्यकारी मजिस्ट्रेट को सूचित करने में विफलता शामिल है।”

अदालत ने डीसीपी को दो सप्ताह के भीतर रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया और गुरुग्राम के सिविल अस्पताल के चिकित्सा अधिकारी डॉ. मानव चौहान को व्यक्तिगत रूप से पेश होकर पोस्टमार्टम रिपोर्ट में विसंगतियों के बारे में स्पष्टीकरण देने के लिए तलब किया।

अदालत मनचंदा की बहन हरसिमरन की ओर से दायर दो अर्जियों पर सुनवाई कर रही थी। इनमें एक याचिका में जांच की न्यायिक निगरानी कराने का आग्रह किया गया है, जबकि दूसरी में बादशाहपुर थाने के पास मौजूद रिकॉर्ड, साक्ष्य, वस्तुओं और डिजिटल सामग्री को अदालत के समक्ष पेश करने और सुरक्षित रखने का अनुरोध किया गया था।

हरसिमरन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अमित प्रसाद ने कहा कि शव के रख-रखाव में गुरुग्राम पुलिस की ओर से कई चूक हुईं। इनमें आसपास के क्षेत्रों में दर्ज गुमशुदगी की रिपोर्ट से मिलान किए बिना शव का अज्ञात व्यक्ति के रूप में अंतिम संस्कार करना भी शामिल है, जबकि मनचंदा के लापता होने के संबंध में लाजपत नगर थाने में पहले ही प्राथमिकी दर्ज हो चुकी थी।

अदालत ने कहा कि अज्ञात शव 10 सितंबर को मिला था लेकिन उसकी जानकारी और तस्वीरें जिपनेट पर 16 सितंबर को अपलोड की गईं, यानी शव का अंतिम संस्कार किए जाने के दो दिन बाद।

जिपनेट लापता व्यक्तियों और अज्ञात शवों से संबंधित सूचनाओं के प्रसार के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक एकीकृत ऑनलाइन मंच है।

अदालत ने इसे ‘‘घोर लापरवाही’’ और अज्ञात शवों के संबंध में तय मानक संचालन प्रक्रिया का पालन न करने का मामला बताया।

न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इस जानकारी को अपलोड करने में छह दिनों की देरी हुई। इस देरी से न केवल साक्ष्य संरक्षण प्रभावित हुआ बल्कि परिवार को मृतक का अंतिम संस्कार करने के अधिकार से भी वंचित होना पड़ा। शिकायतकर्ता ने न केवल अपने भाई को कथित तौर पर बर्बर हत्या में खो दिया, बल्कि गुरुग्राम पुलिस की कथित चूक के कारण वह उसका शव देख तक नहीं सकी और न ही अंतिम संस्कार कर सकी।’’

अदालत ने यह भी कहा कि शव को 72 घंटे तक शवगृह में रखा गया था लेकिन उस दौरान जिपनेट पर उसकी जानकारी अपलोड नहीं किए जाने से पहचान की प्रक्रिया का उद्देश्य ही विफल हो गया।

अदालत ने कहा कि दिल्ली पुलिस की जांच अधिकारी चेतना मांडिया की जांच के अनुसार आरोपी ने पीड़ित को गर्दन के पास दो बार गोली मारने की बात स्वीकार की थी। हथियार, मृतक का मोबाइल फोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य भी बरामद हुए हैं जो इस संभावना की ओर संकेत करते हैं कि उसकी मौत गर्दन के आसपास दो गोलियां लगने से हुई थी। अदालत ने कहा कि बाद में सबूत छिपाने के उद्देश्य से शव का अंतिम संस्कार कर दिया गया।

अदालत ने पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी नहीं किए जाने और फॉरेंसिक साक्ष्य, जिनमें विसरा तथा डायटम जांच के लिए जरूरी नमूने शामिल थे, सुरक्षित नहीं रखे जाने पर भी गौर किया।

न्यायाधीश ने कहा कि गुरुग्राम पुलिस की ओर से तैयार पोस्टमार्टम रिपोर्ट जांच की थ्योरी से मेल नहीं खाती। रिपोर्ट में बाहरी चोटों के सामने ‘‘कुछ नहीं’’ लिखा गया है और गर्दन, सिर, खोपड़ी, मस्तिष्क की झिल्लियों और पसलियों समेत अंदरूनी हिस्सों में ‘‘कोई असामान्यता नहीं मिली’’ दर्ज किया गया है। इसके बाद चिकित्सक ने मौत का कारण ‘‘ डूबना’’ बताया।

अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्षत-विक्षत शव का एक्स-रे क्यों नहीं कराया गया ताकि गोलियों जैसी छिपी हुई धातु की वस्तुओं का पता लगाया जा सके।

अदालत ने कहा कि पोस्टमार्टम के दौरान नियमों का पालन नहीं किया गया और उसने गुरुग्राम पुलिस तथा संबंधित चिकित्सक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 238 के तहत जांच का आदेश दिया। यह धारा अपराध के साक्ष्य को गायब करने या गलत सूचना देने से संबंधित है।

मामले के रिकॉर्ड के अनुसार मनचंदा छह सितंबर को लापता हुए थे और 11 सितंबर को लाजपत नगर थाने में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। दिल्ली पुलिस ने 16 सितंबर को उनके पूर्व सहकर्मी अन्या वत्स और उसके साथी संयम सचदेवा को उत्तराखंड से गिरफ्तार किया था।

अदालत ने मामले को यथास्थिति रिपोर्ट और चिकित्सा अधिकारी की व्यक्तिगत उपस्थिति के लिए 15 अक्टूबर को सूचीबद्ध किया है।

भाषा

राखी पवनेश

पवनेश