प्रयागराज, 21 सितंबर (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, प्रयागराज के विधि विभागाध्यक्ष और पुरुष छात्रावास के वार्डन के खिलाफ दो छात्रों की ओर से लगाए गए जातिगत अपमान और भेदभाव के आरोपों को लेकर स्वतंत्र जांच का आदेश दिया है।
इसके अलावा न्यायमूर्ति विनोद दीवाकर ने एक छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं के स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन का भी निर्देश दिया और संबंधित विभागाध्यक्ष-वार्डन को याचिकाकर्ताओं से जुड़े मूल्यांकन, अनुशासनात्मक मामलों या छात्रावास संबंधी मामलों में किसी भी भूमिका से रोक दिया।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि वह आरोपों की सत्यता को लेकर कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं कर रही है।
अदालत ने प्रयागराज की जिला अदालत की न्यायाधीश अर्चना सिंह और विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अरुण कुमार यादव को जांच कर अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा।
इस जांच में यह पता लगाया जाएगा कि क्या प्रतिवादी संख्या छह (विभागाध्यक्ष-वार्डन) द्वारा अनुसूचित जाति.. अनुसूचित जनजाति समुदायों से जुड़े इन विद्यार्थियों के साथ इनकी जाति के आधार पर भेदभाव या उत्पीड़न किया गया।
समिति यह जांच भी करेगी कि क्या इन आरोपों के संबंध में की गई शिकायत पर विश्वविद्यालय द्वारा सख्ती से कार्रवाई की गई या नहीं।
उच्च न्यायालय ने विद्यार्थी की उत्तर पुस्तिका का प्रतिवादी संख्या छह द्वारा किए गए मूल्यांकन का एक स्वतंत्र समिति से पुनर्मूल्यांकन कराने का कुलपति को निर्देश दिया। यह याचिका शुभेंदु आनंद और एक अन्य छात्र द्वारा दायर की गई है।
जहां प्रथम याचिकाकर्ता पीएचडी का छात्र है, वहीं दूसरा याचिकाकर्ता बीए एलएलबी के पांचवे सेमेस्टर का छात्र है और छात्रावास में रह रहा है। इनकी शिकायत है कि विभागाध्यक्ष ने जाति के आधार पर उनका उत्पीड़न करने के लिए अकादमिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था का इस्तेमाल किया।
पांचवे सेमेस्टर के विद्यार्थी ने 20 अगस्त, 2026 को कुलपति से शिकायत कर आरोप लगाया था कि विश्वविद्यालय बार बार रिमाइंडर देने के बावजूद उनकी शिकायत पर कार्रवाई करने में विफल रहा।
शिकायत में विद्यार्थी ने कहा कि संवैधानिक कानून-1 ‘गोल्ड मेडल’ विषय है और उसने इस विषय में सबसे अधिक अंक प्राप्त किए थे।
उसने आरोप लगाया कि प्रतिवादी संख्या छह ने चौथे सेमेस्टर की शुरुआत में कहा था ‘जो इस विषय में सबसे अधिक अंक लेकर आया है, अब मेरे विषय में लेकर आए।’
छात्र के मुताबिक, उसकी जाति के कारण उसकी उत्तर पुस्तिका का कड़ा मूल्यांकन किया गया और संबंधित शिक्षक ने सार्वजनिक रूप से जाति एवं आरक्षण को लेकर अपमानजनक टिप्पणी की थी।
अदालत ने 16 सितंबर के अपने आदेश में कहा, प्रतिवादी संख्या छह को जांच पूरी होने तक सभी प्रशासनिक जिम्मेदारियों से मुक्त रखा जाए। कुलपति अदालत को इस बात से अवगत कराएं कि क्या विश्वविद्यालय ने समान अवसर प्रकोष्ठ का गठन किया है या नहीं।
अदालत ने इस मामले में अगली सुनवाई की तिथि 24 सितंबर तय की। भाषा सं राजेंद्र शोभना
शोभना