नैनीताल, 19 सितंबर (भाषा) उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने चंडीगढ़ स्थित पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय की पूर्व अतिरिक्त महाधिवक्ता और दिल्ली की एक विधिक फर्म से जुड़े उसके वकील पति के विवाह को समाप्त करने के एक परिवार अदालत के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि पति मानसिक क्रूरता के मामले को साबित करने में सफल रहा है।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने देहरादून की परिवार अदालत द्वारा पांच अप्रैल 2024 को पारित तलाक के आदेश को चुनौती देने वाली पत्नी की पहली अपील खारिज कर दी।
उच्च न्यायालय ने व्यक्ति को अपनी नाबालिग बेटी की देखभाल और पढ़ाई-लिखाई के लिए 70 लाख रुपये और पत्नी को स्थायी गुजारा-भत्ता के तौर पर 40 लाख रुपये देने का भी निर्देश दिया।
दंपति का विवाह तीन मार्च, 2014 को हुआ था और सितंबर 2015 में उनकी बेटी का जन्म हुआ था। दोनों अप्रैल 2016 से अलग रहने लगे। नवंबर 2016 में, पति ने हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता और परित्याग के आधार पर तलाक के लिए याचिका दायर की। परिवार अदालत ने 2024 में तलाक़ मंज़ूर कर दिया, जिसके बाद पत्नी ने इस निर्णय को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
उच्च न्यायालय ने उन आरोपों पर विचार किया जिनमें कहा गया था कि पत्नी ने पति, उसके माता-पिता, रिश्तेदारों, सहकर्मियों और वरिष्ठ अधिकारियों के साथ गलत व्यवहार किया, उसने पति पर अपनी कॉर्पोरेट वकालत छोड़कर चंडीगढ़ जाने के लिए बार-बार दबाव डाला, उसने पति के मेडिकल जांच करवाने पर जोर दिया और उसने पति एवं उनकी बेटी को अपने सास-ससुर से दूर करने की कोशिश की।
पति ने स्वयं को गवाह के रूप में पेश करने के अलावा, अपने समर्थन में अपने माता-पिता और एक वकील को पेश किया, जबकि पत्नी की ओर से वही एकमात्र गवाह थी।
पीठ ने पत्नी की इस दलील को खारिज कर दिया कि आरोप केवल वैचारिक मतभेद और और वैवाहिक जीवन में सामान्य तौर पर छोटे-मोटे झगड़े को ही दर्शाते हैं।
अदालत ने कहा कि सहकर्मियों और परिचितों के सामने बार-बार अपमानित किए जाने से जीवनसाथी की गरिमा और मानसिक सेहत पर गंभीर असर पड़ सकता है, खासकर तब जब दोनों पक्ष खुद कानूनी पेशे से जुड़े हों।
पीठ ने माना कि यह व्यवहार सामान्य वैवाहिक कलह की सीमा को पार कर गया है और मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
अदालत ने यह भी कहा कि दोनों पक्ष 2016 से मुकदमा लड़ रहे हैं और एक दशक से अधिक समय से अलग-अलग रह रहे हैं। अदालत ने कहा कि परिवार अदालत, उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायायलय में सुलह की कई कोशिशें नाकाम रही हैं।
उच्च न्यायालय ने तलाक के आदेश को बरकरार रखते हुए नाबालिग बेटी की देखभाल उसकी मां को सौंप दी और पति को उससे मिलने के अधिकारों को भी मान्यता दी।
भाषा सं दीप्ति अमित
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