नयी दिल्ली, 25 जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदू देवी-देवताओं के बारे में जानकारी पाठ्यपुस्तकों में शामिल किए जाने की पैरवी करते हुए कहा है कि अभिभावकों को भी अपने धर्म के बारे में बच्चों के सवालों का जवाब देने में सक्षम होना चाहिए।
भागवत ने शुक्रवार को ‘युगानुकूल मातृत्व’ विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि बच्चे हिंदू देवी-देवताओं के बारे में अक्सर सवाल पूछते हैं लेकिन माता-पिता कई बार उनका जवाब नहीं दे पाते।
उन्होंने कहा, ‘‘बच्चे अक्सर आकर ऐसे सवाल पूछते हैं, जिनका जवाब देना जरूरी होता है। वे पूछते हैं, ‘इन देवता का मुख वानर जैसा क्यों है? इन देवता का मुख हाथी जैसा क्यों है?’ लेकिन इसका जवाब न पिता को पता होता और ना ही मां को।’’
भागवत ने कहा, ‘‘इन बातों की जानकारी शुरू से ही पाठ्यपुस्तकों में होनी चाहिए। यह आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए। हम बच्चों को जो सिखाएंगे, वे वही ज्ञान हासिल करेंगे। शुरुआती 12 वर्ष में उनका पालन-पोषण हमारे हाथ में होता है। हमें उन्हें जानकारी देनी चाहिए और इसके लिए हमें भी सीखना होगा।’’
आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि मौजूदा पीढ़ी के बच्चों के पालन-पोषण के लिए अलग दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है और निर्देश देने के बजाय उनसे संवाद पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘जब हम बच्चे थे, तब मां कुछ कहती थीं या पिता कहते थे कि बहस नहीं करनी है, तो हम उनकी बात मान लेते थे। हम सवाल या बहस नहीं करते थे क्योंकि हमें पता था कि उन्होंने हमसे अधिक जीवन देखा है और वे चीजों को बेहतर समझते हैं।’’
भागवत ने कहा, ‘‘आज ऐसा नहीं है। आप कठोर रवैया नहीं अपना सकते। बच्चों को हर बात समझानी होगी। वे ऐसे माहौल में बड़े हो रहे हैं, जो भौतिक प्रभावों और हर ओर से लगातार होने वाले प्रचार से प्रभावित है। हमें इस भूलभुलैया से बाहर निकलने का रास्ता खोजने में उनकी मदद करनी होगी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘उन्हें बहुत स्नेह चाहिए। उन्हें हमारा समय चाहिए और उनसे संवाद जरूरी है। निर्देश नहीं, चर्चा होनी चाहिए। आदेश नहीं, सहमति होनी चाहिए।’’
भागवत ने परिवारों में घटती बातचीत पर चिंता जताते हुए कहा कि मोबाइल फोन ने घरों में आपसी बातचीत की जगह ले ली है।
उन्होंने कहा, ‘‘आज परिवारों में लोगों ने आपस में बात करना बंद कर दिया है। परिवार के हर सदस्य के पास मोबाइल फोन है। पति-पत्नी काम से लौटते हैं, बच्चे स्कूल से आते हैं, सभी खाना खाते हैं और फिर हर व्यक्ति अपने मोबाइल में व्यस्त हो जाता है। वे घर तो आते हैं, लेकिन वास्तव में एक-दूसरे से मिलते नहीं हैं। आप सभी ने इसका अनुभव किया होगा।’’
भागवत ने कहा, ‘‘हमें समझना होगा कि समय निकालेंगे तो बातचीत होगी और बातचीत होने पर बच्चे खुलकर अपनी बात कहेंगे। इसी तरह हम उनकी जिज्ञासाओं का समाधान कर पाएंगे।’’
उन्होंने यह भी कहा कि बच्चे अपने माता-पिता के व्यवहार पर बारीकी से नजर रखते हैं और वे उन्हें दी जाने वाली सीख एवं घर में दिखाई देने वाले आचरण के बीच अंतर को तुरंत पहचान लेते हैं।
भागवत ने कहा, ‘‘हम उन्हें जो बताते हैं, वह हमारे जीवन में भी दिखाई देना चाहिए। अन्यथा वे हम पर विश्वास नहीं करेंगे।’’
उन्होंने कहा, ‘‘संस्कार स्नेह, संवाद और अपना उदाहरण पेश कर दिए जाते हैं। ये तीनों अनिवार्य हैं। यह बात पूरी दुनिया पर लागू होती है। यदि यह आधार मजबूत होगा तो बच्चों के लिए प्रौद्योगिकी के जाल से बाहर निकलना बहुत आसान होगा।’’
भागवत ने कहा, ‘‘वे कुछ समय के लिए इसमें फंस भी जाएं तो वापस लौटने का रास्ता खोज सकेंगे लेकिन हमें उन्हें उसी तरह तैयार करना होगा और उनके साथ निकटता बनाए रखनी होगी।’’
भाषा सिम्मी शोभना
शोभना