न्यायालय की रजिस्ट्री में सुधार नहीं ला सका तो अपने कर्तव्य के निर्वहन में चूक जाउंगा:सीजेआई

न्यायालय की रजिस्ट्री में सुधार नहीं ला सका तो अपने कर्तव्य के निर्वहन में चूक जाउंगा:सीजेआई

न्यायालय की रजिस्ट्री में सुधार नहीं ला सका तो अपने कर्तव्य के निर्वहन में चूक जाउंगा:सीजेआई
Modified Date: February 26, 2026 / 10:30 pm IST
Published Date: February 26, 2026 10:30 pm IST

नयी दिल्ली, 26 फरवरी (भाषा) भारत के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत ने बृहस्पतिवार को कहा कि यदि वह अपना कार्यकाल समाप्त होने से पहले उच्चतम न्यायालय रजिस्ट्री में मामलों को सूचीबद्ध करने में सुधार नहीं ला पाया, तो अपने कर्तव्य के निवर्हन में चूक जाउंगा।

भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) ने ये टिप्पणी उत्तर प्रदेश गैंगस्टर अधिनियम से संबंधित एक याचिका की सुनवाई के दौरान की, जिसे उच्चतम न्यायालय की अन्य पीठों ने पहले ही खारिज कर दिया था।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने उच्चतम न्यायालय रजिस्ट्री की कार्य प्रणाली की ‘गहन जांच’ करने की बात कही। पीठ ने कहा कि यह मामला उसके समक्ष कैसे सूचीबद्ध किया गया, जबकि इसी तरह के एक मामले की वर्तमान में उच्चतम न्यायालय की एक अन्य पीठ में सुनवाई जारी है।

पीठ ने इरफान सोलंकी द्वारा दायर याचिका को अपने पास रखा, जिसमें उत्तर प्रदेश गैंगस्टर अधिनियम की वैधता को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि यह केंद्रीय कानून बीएनएस की धारा 111 के विपरीत है।

किसी कानून को तब विपरीत कहा जाता है जब राज्य और केंद्रीय कानून एक ही विषय क्षेत्र को कवर करते हैं, ऐसी स्थिति में केंद्रीय कानून प्रभावी होता है।

उन्होंने कहा कि प्रधान न्यायाधीश का पदभार संभालने के बाद से उन्होंने मामलों की सूची तय करने के संबंध में कड़े कदम उठाए हैं, लेकिन समस्या अब भी बनी हुई है।

उन्होंने कहा, ‘‘पिछले हफ्ते मुझे एक शिकायत मिली और रजिस्ट्री में जो हो रहा है उसे देखकर मैं स्तब्ध रह गया। रजिस्ट्री के अधिकारी सोचते हैं कि वे यहां 20-30 साल के लिए हैं और न्यायाधीश केवल छह-सात साल के लिए। न्यायाधीश आते-जाते रहते हैं। समस्या यह है कि वे सोचते हैं कि हम (न्यायाधीश) सभी अस्थायी अवस्था में हैं और वे इस संस्था में स्थायी हैं।’’

प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘यही हो रहा है और वे सोचते हैं कि रजिस्ट्री को उनके मन मुताबिक काम करना चाहिए। अगर मैं अपने कार्यकाल समाप्त होने से पहले उच्चतम न्यायालय रजिस्ट्री में सुधार नहीं ला पाया, तो अपने कर्तव्य के निर्वहन में चूक जाऊंगा।’’

न्यायालय ने सोलंकी की याचिका पर सुनवाई की अगली तारीख 25 मार्च तय की। सोलंकी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता शोएब आलम ने तब याचिका वापस लेने का अनुरोध किया जब उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज ने उल्लेख किया कि न्यायालय की अन्य पीठों ने राज्य और केंद्रीय कानून के बीच असंगति के आधार पर ऐसी याचिकाओं को खारिज कर दिया है।

सिराज अहमद खान द्वारा दायर एक ऐसी ही याचिका, जिसमें ‘उत्तर प्रदेश गिरोहबंद और असामाजिक गतिविधियां (निवारण) अधिनियम, 1986’ के प्रावधानों को चुनौती दी गई है, वर्तमान में न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ के समक्ष लंबित है। उस मामले में भी एएसजी नटराज पेश हुए थे।

आलम चाहते थे कि सोलंकी की याचिका को खान की याचिका के साथ जोड़ दिया जाए। एएसजी नटराज ने बताया कि तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली दूसरी पीठ ने पहले भी उच्च न्यायालय के उन आदेशों के खिलाफ दायर अपीलों को खारिज कर दिया था जिनमें ‘उप्र गैंगस्टर कानून’ को इसी तरह के आधारों पर चुनौती दी गई थी।

भाषा संतोष पवनेश

पवनेश


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