‘अधिक बल प्रयोग’ की वजह से पुलिस की छवि खराब नहीं की जा सकती : दिल्ली उच्च न्यायालय

‘अधिक बल प्रयोग’ की वजह से पुलिस की छवि खराब नहीं की जा सकती : दिल्ली उच्च न्यायालय

‘अधिक बल प्रयोग’ की वजह से पुलिस की छवि खराब नहीं की जा सकती : दिल्ली उच्च न्यायालय
Modified Date: July 28, 2026 / 07:43 pm IST
Published Date: July 28, 2026 7:43 pm IST

नयी दिल्ली, 28 जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को टिप्पणी की कि विरोध के अधिकार का अभिप्राय ‘संप्रभुता’ को नुकसान पहुंचाना नहीं है और नीट प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ 20 जुलाई को आयोजित ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान कथित तौर पर ‘‘अत्याधिक बल प्रयोग’’ के अधार पर किसी पुलिस अधिकारी की छवि को ‘खराब’ नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने यह टिप्पणी दिल्ली पुलिस के अपर पुलिस उपायुक्त संदीप लांबा से एक मामले की जांच वापस लेने का अनुरोध करने वाली याचिका खारिज करते हुए की। लांबा को कॉकरोच जनता पार्टी (कॉजपा) के ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान एक महिला को थप्पड़ मारते हुए देखा गया था, जिसके बाद उनके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की गई थी।

अधिवक्ता एम. सुफियान सिद्दीकी ने दलील दी कि लांबा के व्यवहार (जैसा कि वीडियो क्लिप में देखा गया है) के कारण, 2025 में कथित तौर पर गैर-कानूनी रूप से हिरासत में लिए जाने की जांच की निष्पक्षता पर से याचिकाकर्ता का भरोसा पूरी तरह से डगमगा गया है। इसलिए, उक्त मामले की जांच किसी स्वतंत्र अधिकारी को सौंपी जानी चाहिए।

न्यायमूर्ति कठपालिया ने कहा कि पुलिस अधिकारी को निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार है, और भले ही उसे किसी महिला को थप्पड़ मारते हुए देखा गया हो, ज़रूरी नहीं कि वह हर मामले में पक्षपाती हो।

अदालत ने कहा, ‘‘ केवल इसलिए कि वह एक वीडियो क्लिप में एक महिला को थप्पड़ मारते हुए दिख रहे हैं, हम उन्हें पूरी तरह गलत नहीं ठहरा सकते। क्या हमें जमीनी सच्चाई की जानकारी है? भीड़ संसद में दाखिल हो सकती थी और गोलीबारी शुरू हो गई होती। कितने ही लोग मारे गए होते।’’

फैसले के मुताबिक, ‘‘विरोध करने का मौलिक अधिकार तो है, लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि आप सुप्रभुता के प्रतीक को नुकसान पहुंचाएं। आप संप्रभुता के आसन के करीब पहुंच रहे थे। ऐसे हालात में, उन्होंने भीड़ को जिस तरह से संभाला,भले ही इसमें अधिक बल प्रयोग किया गया, उसे उनकी छवि खराब करने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।’’

सिद्दीकी ने हालांकि कहा कि याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारी की छवि खराब नहीं कर रहा है। इसपर न्यायाधीश ने सवाल किया, ‘‘अगर मैं इस आधार पर जांच स्थानांतरित कर दूं कि किसी दूसरी घटना में वह किसी को थप्पड़ मारते हुए दिख रहे हैं, तो क्या यह छवि खराब करना नहीं है? मैं बिना उनकी बात सुने ही उन्हें दोषी ठहरा रहा हूं।’’

अधिकारियों के वकील ने कहा कि याचिका अप्रसांगिक हो गयी है, क्योंकि याचिकाकर्ता का बयान दर्ज करने के बाद जांच पहले ही पूरी हो चुकी है और मामले को अंतिम निर्णय के लिए सक्षम प्राधिकार के पास भेज दिया गया है।

याचिका में, 68 वर्षीय जर्निगार फातिमा ने दावा किया कि उन्हें 24-25 मार्च, 2025 की दरमियानी रात जाफराबाद पुलिस थाने में गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया था। इस मामले में पुलिस की ‘ज्यादतियों’ के उनके आरोपों की न्यायिक जांच के लिए लांबा को जांच अधिकारी नियुक्त किया गया था।

याचिका में कहा गया है कि पुलिस की ‘ज्यादती’ का आरोप लगाने वाली एक बुजुर्ग महिला से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह लांबा के व्यवहार से जुड़ी बाद की घटनाओं को नजरअंदाज़ कर दे, क्योंकि ये घटनाएं उसकी शिकायत की जांच करने वाले प्राधिकार पर उसके भरोसे को प्रभावित करती हैं।

भाषा धीरज नरेश

नरेश


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