भारत ट्रंप की नीतियों के ‘दुष्प्रभाव’ से खुद को पूरी तरह नहीं बचा पाया : पूर्व राजदूत डोगरा
भारत ट्रंप की नीतियों के ‘दुष्प्रभाव’ से खुद को पूरी तरह नहीं बचा पाया : पूर्व राजदूत डोगरा
नयी दिल्ली, 30 अगस्त (भाषा) पूर्व राजनयिक राजीव डोगरा ने अपनी नयी किताब में लिखा है कि भारत आर्थिक मदद या रणनीतिक सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर नहीं है, फिर भी वह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों के “दुष्प्रभाव” से खुद को पूरी तरह नहीं बचा पाया है।
‘हाउ नेशन्स फेल एंड द अनमेकिंग ऑफ अमेरिकाज वर्ल्ड’ में डोगरा ने इस बात का आलोचनात्मक विश्लेषण किया है कि सभ्यताएं, साम्राज्य और राष्ट्र कैसे विफल हो गए।
उन्होंने कहा है कि अमेरिका कभी भी भारत का सबसे अच्छा दोस्त नहीं रहा।
इटली में भारत के राजदूत रह चुके डोगरा ने लिखा है, “दुनिया भर में धौंस जमाकर, दादागिरी करके और डींगें हांक कर अपनी बात मनवाने का तरीका लंबे समय से अपनाया जाता रहा है। लेकिन ट्रंप की तबाही मचाने वाली हरकतें अक्सर इन सीमाओं की भी परीक्षा लेती हैं।”
पूर्व राजनयिक ने कहा है कि जो देश किसी न किसी वजह से अमेरिका पर निर्भर हैं, उन्होंने ट्रंप की मांगों के सामने झुकने में ही भलाई समझी है।
हालांकि, उन्होंने लिखा है, “भारत न तो (अमेरिका का) सहयोगी है और न ही दुश्मन। वह आर्थिक मदद या रणनीतिक सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर नहीं है। फिर भी वह ट्रंप की नीतियों के दुष्प्रभाव से खुद को पूरी तरह नहीं बचा पाया है। हालांकि, अफसोस की बात यह है कि उसे कहीं और से ज्यादा सहूलियत नहीं मिलेगी।”
‘हाउ नेशन्स फेल एंड द अनमेकिंग ऑफ अमेरिकाज वर्ल्ड’ का प्रकाशन रूपा पब्लिकेशंस ने किया है।
डोगरा ने किताब में लिखा है कि यूरोप खुद ही कमजोर स्थिति में है और उसे इस बात की चिंता है कि क्या उसके पास इतने सैनिक और कम से कम उतने आधुनिक हथियार हैं, जिनसे वह रूस के आक्रमण का असरदार ढंग से मुकाबला कर सके।
उन्होंने लिखा है कि और रूस “खुशी-खुशी चीन, ईरान और उत्तर कोरिया के साथ जुड़ा हुआ है, इसलिए किसी टकराव की स्थिति में जरूरत पड़ने पर वह (रूस) और उसके सहयोगी भारत की मदद के लिए आगे नहीं आएंगे।”
डोगरा ने कहा है कि इस निराशाजनक स्थिति को देखते हुए अमेरिका से कभी-कभार मिलने वाले रणनीतिक फायदे भारत को होने वाले दीर्घकालिक रणनीतिक नुकसान की भरपाई शायद ही कर पाएंगे।
उन्होंने कहा है, “कुछ विकासशील ताकतों के बीच व्याप्त यह “भ्रामक उम्मीद” कि बहुध्रुवीय दुनिया उनके लिए फायदेमंद होगी, भारत का मनोबल भी बढ़ाती है, लेकिन उदारवादी दुनिया के खत्म होने से वैश्विक मामलों में विविधता नहीं आएगी। इसके बजाय, यह संभव हो सकता है कि आने वाले कई वर्षों तक अमेरिका और चीन ही दुनिया का भविष्य तय करने वाले दो ध्रुव हो जाएंगे।”
भाषा पारुल सुरेश
सुरेश

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