दुर्लभ बीमारियों के उपचार में भारत को अपने तरीके खोजने होंगे: आईसीएमआर प्रमुख

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दुर्लभ बीमारियों के उपचार में भारत को अपने तरीके खोजने होंगे: आईसीएमआर प्रमुख

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  • Publish Date - May 5, 2026 / 05:20 PM IST,
    Updated On - May 5, 2026 / 05:20 PM IST

नयी दिल्ली, पांच मई (भाषा) भारतीय चिकित्सा आयुर्विज्ञान परिषद (आईसीएमआर) के प्रमुख डॉ राजीव बहल ने मंगलवार को कहा कि भारत को दुर्लभ बीमारियों के निदान, उपचार और रोकथाम के लिए पश्चिमी पद्धतियों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय जनसंख्या-आधारित दृष्टिकोण, निवारक रणनीतियों और स्वदेशी नवाचार पर ध्यान देने की जरूरत है।

उन्होंने दुर्लभ बीमारियों से निपटने के लिए संदर्भ-विशिष्ट मॉडल विकसित करने की जरूरत भी बताई।

यहां केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा आयोजित दो-दिवसीय राष्ट्रीय दुर्लभ रोग सम्मेलन को संबोधित करते हुए आईसीएमआर के महानिदेशक ने कहा कि भारत को दुर्लभ बीमारियों के निदान, उपचार और रोकथाम के लिए पश्चिमी पद्धतियों पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय अपने तरीके ईजाद करने होंगे।

उन्होंने कहा कि विकसित देशों के पास अधिक संसाधन हैं, फिर भी भारत जनसंख्या-आधारित दृष्टिकोण, निवारक रणनीतियों और सोशल मीडिया तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) जैसे उभरते उपकरणों सहित डिजिटल प्रौद्योगिकियों के प्रभावी उपयोग के माध्यम से अपनी शक्तियों का लाभ उठाकर व्यापक पहुंच बना सकता है और शीघ्र निदान में सुधार कर सकता है।

इस अवसर पर स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डीएचआर) के सचिव बहल ने पिछले तीन दशकों में दुर्लभ रोगों के क्षेत्र में हुई महत्वपूर्ण प्रगति पर प्रकाश डालते हुए कहा, ‘‘नब्बे के दशक में, किसी संदिग्ध दुर्लभ रोग से पीड़ित रोगी की पहचान होने पर उसकी सहायता मुश्किल होती थी, क्योंकि बीमारी का निदान अत्यंत कठिन था और उपचार के विकल्प लगभग अनुपलब्ध थे।’’

उन्होंने कहा, ‘‘आज, हालांकि उपचारों की उच्च लागत को देखते हुए प्रति रोगी 50 लाख रुपये की वित्तीय सहायता भी अपर्याप्त लग सकती है, फिर भी यह उल्लेखनीय प्रगति है कि देश अब दुर्लभ रोगों से पीड़ित बच्चों को सार्थक सहायता प्रदान करने में सक्षम है।’’

बहल ने कहा कि यह विकास स्वास्थ्य सेवा प्राथमिकताओं में व्यापक बदलाव को दर्शाता है, जहां न केवल सामान्य बीमारियों पर बल्कि दुर्लभ, अक्सर आनुवंशिक स्थितियों से प्रभावित लोगों पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। उन्होंने भारत सरकार के दुर्लभ रोग कार्यक्रम को हजारों बच्चों के लिए आशा का स्रोत बताया और देखभाल प्रदान करने तथा उपचार को आगे बढ़ाने में उत्कृष्टता केंद्रों द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका की सराहना की।

इस अवसर पर केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुण्य सलिला श्रीवास्तव ने कहा कि इस सम्मेलन के आयोजन का मुख्य उद्देश्य हितधारकों के समक्ष आने वाली चुनौतियों को समझना, नवाचारों को प्रोत्साहित करना और देश में दुर्लभ रोगों से निपटने के तरीके को सुदृढ़ करने के लिए नए विचार उत्पन्न करना है।

उन्होंने कहा कि दुर्लभ रोगों से निपटने की आवश्यकता को सर्वप्रथम राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 में प्रमुखता से शामिल किया गया था और बाद में दुर्लभ रोगों के लिए राष्ट्रीय नीति, 2021 के आरम्भ के माध्यम से इसे संस्थागत रूप दिया गया, जिसने हमारे भारत को दुर्लभ रोगों के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय ढांचा रखने वाले देशों में स्थान दिलाया है।

भाषा वैभव सुरेश

सुरेश