भारत की आध्यात्मिक विरासत दुनिया को अधिक जागरूक बना रही है : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

भारत की आध्यात्मिक विरासत दुनिया को अधिक जागरूक बना रही है : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

भारत की आध्यात्मिक विरासत दुनिया को अधिक जागरूक बना रही है : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन
Modified Date: May 29, 2026 / 03:12 pm IST
Published Date: May 29, 2026 3:12 pm IST

(तस्वीर के साथ)

बेंगलुरु, 29 मई (भाषा) उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने बृहस्पतिवार को कहा कि भारत की आध्यात्मिक विरासत और सभ्यतागत ज्ञान दुनिया को अधिक करुणाशील और जागरूक बनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उन्होंने श्री श्री रविशंकर के विश्वभर में शांति, सद्भाव और मानवीय मूल्यों का संदेश फैलाने के प्रयासों की सराहना की।

उपराष्ट्रपति ने ‘द आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन’ के 45 वर्ष पूरे होने के अवसर पर युवा विकास, उद्यमिता, स्थिरता और शिक्षा से जुड़ी पांच पहलों की शुरुआत की।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ आंदोलन करुणा, सहनशीलता, स्पष्टता और आनंद को बढ़ावा देने वाली एक वैश्विक मानवीय और आध्यात्मिक शक्ति बनकर उभरा है।

उन्होंने कहा, ‘‘जीवन जीना एक कला होनी चाहिए। संघर्ष और अनिश्चितताओं से भरी दुनिया में आपको हर दिन अपने जीवन का आनंद लेना चाहिए।’’

उन्होंने कहा कि श्री श्री रविशंकर ज्ञान, जागरूकता, शांति और सद्भाव जैसे मूल्यों के माध्यम से मानवता को प्रेरित कर रहे हैं और विभिन्न परिस्थितियों में लोगों को मानसिक शांति प्रदान कर रहे हैं।

उपराष्ट्रपति ने ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ के 45 वर्षों के योगदान को चिह्नित करने वाला एक स्मारक डाक टिकट भी जारी किया। यह संस्था व्यक्तिगत कल्याण, सामाजिक परिवर्तन और वैश्विक शांति के लिए कार्य कर रही है।

भक्ति के अर्थ पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि भक्ति केवल ईश्वर की पूजा नहीं है, बल्कि आत्मबोध प्राप्त करने का मार्ग है।

उन्होंने कहा, ‘‘भक्ति समर्पण है। हमें स्वयं के प्रति, अपने परिवार, समाज, राष्ट्र और समूची मानवता के प्रति समर्पित होना चाहिए।’’

राधाकृष्णन ने कहा कि उन्हें यह जानकर आश्चर्य हुआ कि ‘आर्ट ऑफ लिविंग’ के केंद्र 181 देशों में संचालित हो रहे हैं और इस आंदोलन ने विभिन्न महाद्वीपों, संस्कृतियों, भाषाओं और कई पीढ़ियों के लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया है।

उन्होंने कहा कि भारत आज इतिहास के एक अनोखे दौर में खड़ा है, जहां देश आत्मविश्वास से भरी आकांक्षाओं और वैश्विक मंच पर अपनी बढ़ती भूमिका के साथ आगे बढ़ रहा है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सभ्यतागत ज्ञान, योग, तंदरुस्ती और स्थिरता पर जोर इसी दिशा को दर्शाता है।

भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका का उल्लेख करते हुए राधाकृष्णन ने कहा कि देश की आध्यात्मिक विरासत और आधुनिक नेतृत्व मिलकर दुनिया को अधिक करुणाशील बना रहे हैं।

उपराष्ट्रपति ने ‘‘वसुधैव कुटुंबकम्’’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्राचीन भारतीय विचार पूरी दुनिया को एक परिवार मानता है।

राधाकृष्णन ने अपनी जड़ों और परंपराओं से जुड़े रहने के महत्व पर जोर देते हुए कहा, ‘‘किसी को अपनी जड़ों को नहीं भूलना चाहिए। किसी को अपने गांव को नहीं भूलना चाहिए। किसी को अपने कुलदेवता को नहीं भूलना चाहिए।’’

उन्होंने कहा, ‘‘अगर आपको आधुनिक विकास चाहिए, तो इसका मतलब यह नहीं कि आपको अपने पारंपरिक मूल्यों को छोड़ देना चाहिए। बदलाव जरूरी हैं। बदलाव ही दुनिया में स्थायी चीज है, लेकिन हमें केवल अच्छे बदलावों को स्वीकार करना चाहिए। जो पारंपरिक रूप से अच्छा है, उसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए।”

उन्होंने आयुर्वेद, प्राकृतिक खेती, नदी पुनर्जीवन, वृक्षारोपण और नशामुक्त भारत अभियान को बढ़ावा देने में संगठन के प्रयासों की भी सराहना की।

युवाओं से नशे से दूर रहने का आग्रह करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘आपका मन आपके नियंत्रण में होना चाहिए। आपका मन किसी और चीज के नियंत्रण में नहीं होना चाहिए।’’

उपराष्ट्रपति ने संगठन के स्वयंसेवकों को ‘‘सेवा के मौन शिल्पकार’’ बताते हुए उनकी प्रशंसा की।

भाषा गोला संतोष

संतोष


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