(गुंजन शर्मा)
नयी दिल्ली, 27 सितंबर (भाषा) सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर भारतीयों के बीच बातचीत में सबसे अधिक अप्रत्यक्ष आक्रामकता प्रमुख सामाजिक, वित्तीय, खेल और राजनीतिक घटनाक्रमों के दौरान देखने को मिलती है। दो प्रमुख बिजनेस स्कूल के हालिया अध्ययन से यह बात सामने आई है।
गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट (जीआईएम) और गोवा बिजनेस स्कूल के शोधकर्ताओं ने आक्रामक बातचीत के रुझान का अध्ययन करने के लिए ‘मशीन लर्निंग’ मॉडल का इस्तेमाल कर 1.31 लाख से अधिक पोस्ट का विश्लेषण किया। इस अध्ययन के नतीजे ‘एडवांसेज इन कंज्यूमर रिसर्च’ पत्रिका के हालिया अंक में प्रकाशित किए गए हैं।
अध्ययन में इस बात का पता लगाने की कोशिश की गई है कि क्या ‘मशीन लर्निंग’ भारतीयों की ओर से ‘एक्स’ पर किए गए पोस्ट में आक्रामकता के अलग-अलग स्वरूपों की पहचान करने में मदद कर सकती है। इसमें यह भी जानने का प्रयास किया गया है कि भावनात्मक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील घटनाओं के दौरान आक्रामक व्यवहार में किस तरह का अंतर होता है।
शोधकर्ताओं ने पोस्ट को तीन श्रेणियों में बांटा—पहली : स्पष्ट रूप से आक्रामक (ओएजी), दूसरी : अप्रत्यक्ष तौर पर आक्रामक (सीएजी) और तीसरी : गैर-आक्रामक (एनएजी)।
शोध दल में शामिल जीआईएम के प्रोफेसर लक्ष्मी विष्णु मूर्ति तुनुगुंटला ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘नतीजों से पता चलता है कि जिन चार क्षेत्रों की घटनाओं का अध्ययन किया गया, उनमें भारतीयों की ओर से ‘ओएजी’ प्रतिक्रियाएं तुलनात्मक रूप से कम (11 से 37 फीसदी) के बीच रहीं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘हर घटना के बाद समय के साथ आक्रामकता के स्तर में भी आमतौर पर कमी देखी गई, हालांकि अलग-अलग घटनाओं में कमी की दर काफी अलग-अलग थी।’’
प्रोफेसर तुनुगुंटला के मुताबिक, अध्ययन में पाया गया कि कई घटनाओं के दौरान अप्रत्यक्ष आक्रामकता आम थी।
उन्होंने कहा, “टी20 विश्व कप में भारतीय टीम की हार के दौरान स्पष्ट आक्रामकता सबसे ज्यादा (37 प्रतिशत) देखने को मिली। आमतौर पर समय के साथ आक्रामकता में कमी आई, हालांकि अलग-अलग घटनाओं में इसका रुझान अलग-अलग रहा। ऑनलाइन प्रतिक्रियाएं घटना और उसकी अवधि के आधार पर अलग-अलग दर्ज की गईं।”
जीआईएम के ‘बिग डेटा एनालिटिक्स’ विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर पी. बालासुब्रमण्यम के अनुसार, यह अध्ययन भावनाओं और आक्रामकता के बीच अंतर को रेखांकित करता है।
उन्होंने कहा, ‘‘जहां भावनाओं के विश्लेषण के दौरान बातचीत को व्यापक रूप से सकारात्मक, नकारात्मक या तटस्थ श्रेणियों में रखा जाता है, वहीं आक्रामकता का पता लगाते समय नुकसान पहुंचाने वाली या शत्रुतापूर्ण भाषा पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, जो हमेशा नकारात्मक भावना से मेल नहीं खाती।’’
सुब्रमण्यम ने कहा, “यह अध्ययन कम्प्यूटेशनल सामाजिक विज्ञान में प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण और मशीन लर्निंग के इस्तेमाल में योगदान देता है, जिसके ऑनलाइन मॉडरेशन, जिम्मेदार संवाद नीतियों और डिजिटल व्यवहार पर आगे के शोध के लिए संभावित प्रभाव हो सकते हैं।”
भाषा पारुल सुरेश
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