नयी दिल्ली, 12 फरवरी (भाषा) औद्योगिक श्रेत्र के तीन कानूनों की जगह लेने वाली औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 में सरकार द्वारा पेश संशोधन पर लोकसभा में चर्चा करते हुए विपक्ष ने इसे उद्योगों के हित वाला तथा श्रमिक क्षेत्र के लिए असुरक्षा पैदा करने वाला कदम बताया, वहीं भाजपा ने कहा कि इसका मकसद श्रमिक सुधारों को लागू करते हुए सभी पक्षों के हितों की रक्षा करना है।
लोकसभा में बृहस्पतिवार को केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया ने ‘औद्योगिक संबंध संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026’ को चर्चा और पारित कराने के लिए पेश किया।
प्रस्तावित कानून के उद्देश्यों और कारणों संबंधी कथन के अनुसार, औद्योगिक सबंध संहिता, 2020 जिन कानूनों की जगह लेगा, उनमें ट्रेड यूनियन्स अधिनियम, 1926, औद्योगिक रोजगार (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 शामिल हैं, जो श्रमिक संघों, औद्योगिक रोजगार और औद्योगिक विवादों से संबंधित हैं।
केंद्रीय मंत्री ने कहा, ‘‘यह संशोधन एक छोटे से स्पष्टीकरण के लिए लाया गया है। नयी संहिता लागू होने पर पुराने तीनों कानूनों को रद्द कर दिया गया, लेकिन इस संबंध में कानून में भी स्पष्टीकरण आ जाए, इसलिए यह संशोधन लेकर आए हैं।’’
उन्होंने कल इसे सदन में पेश किया था।
विधेयक पर चर्चा की शुरुआत करते हुए कांग्रेस सांसद के. सुरेश ने कहा कि यह विधेयक सुधार वाला नहीं, बल्कि पीछे लौटाने वाला है और इसका उद्देश्य क्रमबद्ध तरीके से पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के समय के श्रमिक सुरक्षा सुधारों को समाप्त करना है।
उन्होंने बृहस्पतिवार को देश के कुछ हिस्सों में श्रमिक संगठनों की हड़ताल का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें केंद्रीय कर्मचारी संगठनों और सरकारी क्षेत्र के लोग, बैंक, बीमा क्षेत्र के कर्मी शामिल हैं और यह सरकार के लिए चेतावनी है।
सुरेश ने कहा, ‘‘लेकिन सरकार संवाद के बजाय अपने प्रभुत्व में विश्वास रखती है।’’
उन्होंने कहा कि इस सरकार में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम कमजोर हो रहे हैं और उनका निजीकरण हो रहा है।
सुरेश ने औद्योगिक संबंध संहिता को वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि सरकार को सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा की गारंटी देनी चाहिए।
उन्होंने कहा, ‘‘असुरक्षित श्रमिकों के साथ विकसित भारत नहीं बना सकते। इस विधेयक पर पुनर्विचार होना चाहिए। इसे वापस लेना चाहिए।’’
चर्चा में भाग लेते हुए शिवसेना (उबाठा) के सांसद अरविंद सावंत ने कहा कि वह जब नरेन्द्र मोदी सरकार में मंत्री थे तो उन्होंने प्रधानमंत्री को सलाह दी थी कि इस संहिता को लाना सही नहीं होगा और तब इसे नहीं लाया गया था, लेकिन बाद में पारित कर दिया गया है।
उन्होंने कहा कि देश में बड़ी संख्या में कर्मचारी अनुबंध व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं और उन्हें स्थायी नहीं किए जाने की वजह से उनमें असुरक्षा की भावना रहती है।
वहीं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सदस्य दर्शन सिंह चौधरी ने कहा कि इस संहिता का मकसद प्रगतिशील श्रमिक सुधारों को लागू करते हुए कर्मचारियों समेत सभी पक्षों के हितों की रक्षा करना है।
उन्होंने कहा कि यह संहिता न केवल अर्थव्यवस्था को सुधारेगी, बल्कि मजदूरों को आगे बढ़ाएगी।
चौधरी ने कहा, ‘‘इससे गैरकानूनी हड़ताल और तालाबंदी रूकेगी। औद्योगिक विवादों का निपटारा होगा। इसमें हड़ताल न मानने वालों की सुरक्षा के प्रावधान हैं।’’
समाजवादी पार्टी (सपा) के अफजाल अंसारी ने कहा कि औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 को पारित करते समय सरकार ने बड़े-बड़े दावे किए कि यह ऐतिहासिक सुधार है, लेकिन पांच साल बीत जाने के बाद अब संशोधन की नौबत आ गई है।
उन्होंने कहा, ‘‘यह सुधार नहीं, जल्दबाजी में बनाया गया कानून और बाद में स्वीकार की गई गलती है।’’
तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी ने भी विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि इस संहिता के आने से मुख्य कानून के प्रभाव ही समाप्त हो गए।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार केवल उद्योगों के हित साध रही है, वहीं श्रमिकों के साथ ‘मजाक’ किया जा रहा है।
भाषा वैभव सुभाष
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