नयी दिल्ली, 12 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कर्नाटक के आलंद में स्थित लाडले मशक दरगाह और हिंदू संत राघव चैतन्य की समाधि के परिसर में महाशिवरात्रि के दौरान पूजा आयोजित करने पर रोक लगाने के अनुरोध वाली याचिका पर बृहस्पतिवार को सुनवाई करने से इनकार कर दिया।
यह तीर्थ स्थल 14वीं शताब्दी के सूफी संत और 15वीं शताब्दी के एक हिंदू संत से जुड़ा है जो ऐतिहासिक रूप से एक साझा पूजा स्थल रहा है। हालांकि, 2022 में दरगाह में धार्मिक अधिकारों को लेकर विवाद उत्पन्न होने पर तनाव बढ़ गया जिससे सांप्रदायिक अशांति फैल गई।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि मामला कर्नाटक उच्च न्यायालय में लंबित है, ऐसे में याचिकाकर्ता संविधान के अनुच्छेद 32 का सहारा नहीं ले सकते।
उच्चतम न्यायालय खलील अंसारी द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। याचिका में संपत्ति में हस्तक्षेप को रोकने और निजी प्रतिवादियों द्वारा संपत्ति में किसी भी ‘‘अवैध प्रवेश, जमावड़ा, आयोजन’’ को रोकने के साथ-साथ प्रवेश एवं पूजा की अनुमति देने वाले किसी भी अंतरिम आदेश पर रोक का अनुरोध किया गया था।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विभा दत्ता मखीजा ने बताया कि उच्च न्यायालय इस मामले पर पहले ही फैसला सुना चुका है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता यह घोषणा चाहता है कि संपत्ति विधिवत अधिसूचित वक्फ की संपत्ति है, जिसका निर्णय वक्फ न्यायाधिकरण द्वारा किया जाना है।
मखीजा ने कहा कि इस मुद्दे में पूजा स्थल अधिनियम से संबंधित विभिन्न मुद्दे शामिल हैं और उन्होंने पीठ से आग्रह किया कि इसे इसी तरह के अन्य मामलों के साथ जोड़ दिया जाए।
पीठ ने हालांकि हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और मामला वापस लिए जाने के कारण उसे खारिज कर दिया गया।
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने फरवरी 2025 में 15 हिंदू श्रद्धालुओं को राघव चैतन्य शिवलिंग पर शिवरात्रि के अवसर पर पूजा करने की अनुमति दी थी।
भाषा सुरभि नरेश
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