नयी दिल्ली, 12 मार्च (भाषा) कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने एक खुला पत्र लिखकर पार्टी सांसद शशि थरूर पर निशाना साधते हुए कहा है कि अब उनसे किसी तरह का संबंध नहीं है, जिसको लेकर थरूर ने पलटवार किया कि अय्यर ने बहुत सारी अनावश्यक टिप्पणियां की हैं।
दोनों के बीच आरोप-प्रत्यारोप की शुरुआत उस वक्त हुई जब अय्यर द्वारा थरूर को एक खुला पत्र लिखा गया जो इस सप्ताह की शुरुआत में ‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था।
अय्यर ने कहा कि वह छह मार्च को एक टीवी चैनल पर इजराइल द्वारा अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ मिलकर ईरान के खिलाफ छेड़े गए ‘‘अवैध युद्ध’’ पर थरूर के सवालों के जवाब से काफी हैरान थे।
अय्यर ने लिखा, ‘‘मैं इतना परेशान हो गया हूं कि सो नहीं सका और सुबह तीन बजे उठकर आपको यह खुला पत्र लिख रहा हूं।’’
अय्यर ने दावा किया कि उन्होंने न केवल कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में थरूर को वोट देकर अपना राजनीतिक करियर दांव पर लगाया, जबकि उन्हें पता था कि थरूर बुरी तरह हारेंगे, बल्कि अगले दिन ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में यह (आलेख) लिखकर भी कहा कि विजेता मल्लिकार्जुन खरगे को गांधी परिवार और ‘जी-23’ समूह के कुछ लोगों के समर्थन के बावजूद उनके खिलाफ खड़े होने के (थरूर के) लोकतांत्रिक अधिकार का उदारतापूर्वक सम्मान करना चाहिए।
उन्होंने लेख में कहा, ‘‘लेकिन कुछ शुरुआती संकेत थे कि आप ‘हम में से एक’ नहीं थे। अब, एक ऐसे शासन के प्रति आपकी गहरी सहानुभूति ने इस पर पड़े पर्दे को हटा दिया है…यह रास्ते अलग होने का मामला है।’
अय्यर पर पलटवार करते हुए, थरूर ने एक खुला पत्र लिखा, जिसे एनडीटीवी ने बृहस्पतिवार को प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने कहा कि असहमति एक समृद्ध लोकतंत्र की पहचान है, लेकिन किसी सहयोगी के इरादों या देशभक्ति पर सिर्फ इसलिए सवाल उठाना उचित नहीं है कि वह विदेश नीति के लिए एक अलग दृष्टिकोण अपनाते हैं।
थरूर ने कहा, ‘हालांकि आप अपने विचार रखने के हकदार हैं, लेकिन मेरा रुख (और मेरे चरित्र) का आपका हालिया सार्वजनिक ‘मूल्यांकन’ स्पष्ट प्रतिक्रिया की मांग करता है।’’
थरूर ने कहा, ‘मैंने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मामलों को स्पष्ट राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से देखा है, भारत के हितों, सुरक्षा और वैश्विक स्थिति को हर चर्चा के केंद्र में रखा है। भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को पहचानना और भारत की अर्थव्यवस्था और रणनीतिक स्थिति के लिए परिणामों का आकलन करना ‘नैतिक आत्मसमर्पण’ नहीं है, यह जिम्मेदार शासनकला है।’’
उन्होंने तर्क दिया कि भारत की कूटनीति ऐतिहासिक रूप से व्यावहारिकता के साथ सिद्धांत को संतुलित करती है।
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