‘बस देखना चाहते थे कि यह कैसा दिखता है’: कॉजपा आंदोलन खत्म होने के बाद सेल्फी लेने जंतर-मंतर पहुंचे छात्र
‘बस देखना चाहते थे कि यह कैसा दिखता है’: कॉजपा आंदोलन खत्म होने के बाद सेल्फी लेने जंतर-मंतर पहुंचे छात्र
(मानसी जगानी)
नयी दिल्ली, 27 जुलाई (भाषा) वह मंच, जहां कार्यकर्ता सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे थे, अब हटा दिया गया है। तंबू भी गायब हैं, सामूहिक रसोई भी नहीं है, और विद्यार्थियों का वह वह सैलाब भी नहीं है, जिसने हफ्तों तक उस सड़क को सुर्खियों में बनाए रखा था।
प्रदर्शनकारियों के चले जाने के बाद, हालांकि, जंतर-मंतर पर सन्नाटा नहीं पसरा है ।
छात्रों का 36 दिनों से चला आ रहा आंदोलन समाप्त होने के दो दिन बाद, छात्रों का एक समूह अवरोधकों के बाहर खड़ा होकर उस जगह पर सेल्फी ले रहा था, जहां ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (कॉजपा) ने धरना दिया था।
वे विरोध प्रदर्शन करने नहीं आए थे। कुछ लोग सिर्फ उत्सुकतावश पहुंचे थे, तो कुछ उस जगह की तस्वीर खींचना चाहते थे, जिसे उन्होंने सोशल मीडिया पर बार-बार देखा था।
दिल्ली में रहकर भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) में दाखिले के लिए कॉमन एडमिशन टेस्ट (कैट) की तैयारी कर रहे जयपुर के 19 वर्षीय छात्र रोहन ने कहा, ‘हर कोई इस जगह के बारे में बात कर रहा था। हमने वीडियो देखे, पुलिस की कार्रवाई देखी और भीड़ देखी। मैं बस यह देखना चाहता था कि जब यहां कोई प्रदर्शन नहीं होता है, तो यह जगह कैसी दिखती है।’
लखनऊ के रहने वाले उसके दोस्त को खाली सड़क में उतनी दिलचस्पी नहीं थी।
उसने कहा, ‘हम देर से आए। हमें पता था कि प्रदर्शन खत्म हो चुका है, फिर भी हम एक बार यहां आना चाहते थे। यहां हजारों लोगों को देखने के बाद इस जगह को इतना खाली देखना अजीब लग रहा है।’
उन्हें प्रदर्शन स्थल के भीतर जाने की अनुमति नहीं थी। सड़क के दोनों ओर अवरोधक लगे हुए थे और छात्र बाहर से ही उस जगह को निहार रहे थे, जहां शनिवार तक पेपर लीक के खिलाफ जवाबदेही की मांग को लेकर हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारी जुटे थे।
आंदोलन के निशान धीरे-धीरे मिट रहे थे, लेकिन पूरी तरह नहीं।
सोमवार को एक पेंटर प्रदर्शन के दौरान क्षतिग्रस्त हुए अवरोधकों को ठीक कर रहा था। उसने उन पर पीला रंग चढ़ाया और लाल ब्रश से ‘दिल्ली पुलिस’ लिखा। सड़क के डिवाइडर की मरम्मत की जा रही थी और उन पर चिर-परिचित पीली और काली पट्टियों वाला रंग चढ़ाया जा रहा था।
पुरुषों के शौचालय के पास आंदोलन के दिनों का सामान अब भी बिखरा पड़ा था: मच्छरदानियां, प्लास्टिक की कुर्सियां, पोस्टर, बर्तन, ईसा मसीह की धूल से भरी तस्वीरें और बी.आर. आंबेडकर की एक मूर्ति।
सड़क की सफाई की जा रही थी, लेकिन आंदोलन के दिनों की बदबू अभी पूरी तरह गई नहीं थी। दक्षिण भारतीय रेस्तरां की एक कतार के बाहर नालों की सफाई की जा रही थी और हवा में बदबू बनी हुई थी।
जनपथ मार्केट और आसपास की दुकानों में दुकानदारों ने अपने प्रतिष्ठान फिर से खोल दिए थे। चाय वाले अपनी रेहड़ियों पर लौट आए थे और दफ्तर जाने वाले लोग भी वापस दिखने लगे थे।
हालांकि, अपने आसपास आंदोलन को बढ़ते देखने वाले व्यापारियों के लिए दुकानें खुलते ही स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाई है।
पिछले चार दशकों से दुकान चला रहे बावा ने बताया कि अवरोधकों और सड़कें बंद होने से वे ग्राहकों से पूरी तरह कट गए, जिनके भरोसे उनका कारोबार चलता था।
उन्होंने कहा, ‘दफ्तर आने-जाने वाले लोगों ने आना बंद कर दिया। पिछले हफ्ते तो इंटरनेट भी बंद कर दिया गया था, मेट्रो और सड़कें भी प्रभावित थीं। हमारा कारोबार लगभग ठप हो गया था।’
उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारी खुद इस नुकसान की भरपाई के लिए काफी नहीं थे।
बावा ने कहा, ‘प्रदर्शनकारियों को मुफ्त खाना बांटा जा रहा था, इसलिए बहुत कम कारोबार हुआ। पुलिस लोगों को कई तरफ से आने नहीं दे रही थी। अब भी इलाके में अवरोधक लगे हैं। सब कुछ सामान्य होने में थोड़ा वक्त लगेगा।’
लगभग दो दशकों से जंतर-मंतर के पास चाय बेच रहे दिनेश शर्मा ने अन्ना हजारे आंदोलन सहित कई आंदोलनों के साक्षी बने हैं। लेकिन उनका कहना है कि छात्रों के इस प्रदर्शन में एक अलग तरह की भीड़ आई थी।
उन्होंने कहा, ‘पहले लोग बातें सुनने आते थे। ये युवा अपने फोन के साथ आए थे। वे कूद रहे थे, चिल्ला रहे थे और हर चीज रिकॉर्ड कर रहे थे। ऐसा लग रहा था कि हर व्यक्ति वीडियो ही बना रहा है।’
इस प्रदर्शन ने सड़क को एक ऐसी जगह में बदल दिया था जहां लगभग हर चीज पर नजर रखी जा रही थी – और रिकॉर्ड की जा रही थी। सोमवार तक उनकी चाय की दुकान पर भीड़ बदल चुकी थी। पास ही द्रुत कार्य बल (आरएएफ) के करीब 20-30 जवान अपनी ड्यूटी खत्म होने का इंतजार करते हुए फोन चला रहे थे।
एक अधिकारी ने कहा, ‘हम आज रात भी यहीं रहेंगे।’
प्रदर्शन खत्म होने के बाद भी सुरक्षा बल तैनात थे। सड़क पर अवरोधक अब भी लगे थे और पास में खड़ी पुलिस हिरासत वाली बस काफी पुरानी और खस्ताहाल लग रही थी।
और इससे पहले कि यह जगह अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट पाती, एक और प्रदर्शन शुरू हो गया।
‘गोरखालैंड राष्ट्रीय मंच’ की अगुवाई में फुटपाथ पर लाल कालीन बिछाकर करीब 50-60 लोग अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर नारेबाजी कर रहे थे। उन्हें दो दिन के प्रदर्शन की अनुमति मिली थी और वे रविवार व सोमवार को वहीं रहने की योजना बना रहे थे।
उनका प्रदर्शन ठीक उसी जगह हो रहा था, जिसका हाल ही में अपना एक इतिहास बन गया था। यह वही जगह थी जहां कॉजपा के संस्थापक अभिजीत दिपके ने बोस्टन से आने के बाद अपना पहला पोस्टर लगाया था।
भाषा सुमित रंजन
रंजन

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