न्यायालय की पीठ में ‘विशिष्ट विधिवेत्ताओं’ की अनुपस्थिति पर न्यायमूर्ति भुइयां ने जताई चिंता

न्यायालय की पीठ में ‘विशिष्ट विधिवेत्ताओं’ की अनुपस्थिति पर न्यायमूर्ति भुइयां ने जताई चिंता

न्यायालय की पीठ में ‘विशिष्ट विधिवेत्ताओं’ की अनुपस्थिति पर न्यायमूर्ति भुइयां ने जताई चिंता
Modified Date: August 30, 2026 / 06:29 pm IST
Published Date: August 30, 2026 6:29 pm IST

नयी दिल्ली, 30 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने रविवार को शीर्ष अदालत में ‘जाने-माने कानूनविदों’ को न्यायाधीश के तौर पर नियुक्त करने का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि इससे पीठ में प्रतिभाशाली लोग शामिल होंगे और नामी विद्वानों को फैसले लेने की प्रक्रिया में योगदान देने का मौका मिलेगा।

न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि यह अफसोस की बात है कि संविधान के अनुच्छेद 124 (3)(सी) में ऐसी नियुक्ति का प्रावधान होने के बावजूद, पिछले 76 सालों में उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों या वकालत करने वाले वकीलों के अलावा कोई भी व्यक्ति उच्चतम न्यायालय तक नहीं पहुंचा है।

उन्होंने कहा कि या तो केंद्र और कॉलेजियम को लगा कि भारतीय शिक्षा जगत में न्यायाधीश बनने के लिए “गंभीरता से विचार किए जाने” लायक “पर्याप्त गहराई” नहीं है, या फिर दोनों ही प्राधिकारों ने अब तक इस प्रावधान पर “गंभीरता से विचार नहीं किया है”।

न्यायमूर्ति भुइयां ने इस बात को “बहुत सतही आपत्ति” बताया कि कानूनी जानकारों में व्यावहारिक अनुभव की कमी होती है। उन्होंने कहा कि अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन, कनाडा और केन्या समेत कई देशों में जाने-माने शिक्षाविदों को संवैधानिक अदालतों का न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है।

न्यायमूर्ति भुइयां राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली के स्नातकोत्तर छात्रों के लिए आयोजित 13वें दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा, “संविधान के 76 साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद, अब तक उच्चतम न्यायालय में किसी विधि विशेषज्ञ की नियुक्ति नहीं हुई है। यह अफसोस की बात है कि यह प्रावधान हमारे संविधान के उन प्रावधानों में से एक बना हुआ है जिनका कभी इस्तेमाल नहीं किया गया।”

उन्होंने कहा, “अब तक किसी भी कानूनी शिक्षाविद् को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त नहीं किया गया है, जबकि ऐसे कई बेहतरीन जानकार मौजूद हैं जो पीठ का हिस्सा बनने पर अहम योगदान दे सकते थे।”

न्यायमूर्ति भुइयां ने कहा कि देश की नैतिक, कानूनी और संवैधानिक चेतना के संरक्षक के तौर पर उच्चतम न्यायालय “तकनीकी बारीकियों से ऊपर” है, और शिक्षा जगत, बार और पीठ में भारत की वास्तविक विविधता झलकनी चाहिए।

जस्टिस भुइयां ने कहा, “ ‘विशिष्ट विधिवेत्ता’ का यह प्रावधान इसलिए रखा गया है ताकि पीठ में प्रतिभाशाली न्यायाधीशों को शामिल करके विविधता लाई जा सके। माना जाता था कि अपनी अकादमिक विशेषज्ञता के कारण, इस श्रेणी के विशिष्ट न्यायविद् संकीर्ण तकनीकी बारीकियों तक सीमित नहीं रहेंगे और इस तरह वे सार्वजनिक कानून से जुड़े मामलों को संभालने के लिए बेहतर स्थिति में होंगे।”

भाषा प्रशांत नरेश

नरेश


लेखक के बारे में