नयी दिल्ली, 24 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की यह टिप्पणी कि जीतने वाली टीम द्वारा चुना गया अंपायर हमेशा शक के घेरे में रहता है, संसद में विपक्ष के उस रुख की याद दिलाती है जो निर्वाचन आयोग के सदस्यों की नियुक्ति से जुड़े विधेयक पर चर्चा के दौरान सामने आया था।
न्यायमूर्ति दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने बुधवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून पर खंडित फैसला सुनाया।
न्यायमूर्ति दत्ता ने कहा कि ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023′ के तहत बनी चयन समिति में एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल करना ‘धारणा की कसौटी’ पर खरा नहीं उतरता और इससे सरकार (कार्यपालिका) को प्रभावी वीटो मिल जाता है।
उन्होंने क्रिकेट का उदाहरण देते हुए कहा कि अगर क्रिकेट मैच में अंपायर को किसी एक टीम का कप्तान चुनता है और उसी की टीम जीत जाती है, तो भले ही अंपायर के फैसले सही हों, तो भी “उस पर शक की गुंजाइश बनी रहती है।”
दिसंबर 2023 में, जब यह विधेयक राज्यसभा और बाद में लोकसभा में विचार और पारित करने के लिए आया, तो विपक्ष के कुछ सदस्यों ने इसी तरह के मुद्दे उठाए थे।
उन्होंने तर्क दिया था कि यह विधेयक निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता से समझौता करने वाला है, जिससे लोकतांत्रिक वैधता कमजोर होती है।
लोकसभा में, एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था कि यह कानून चयन समिति से भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) को बाहर करके उच्चतम न्यायालय के फैसले को पलटने वाला है।
विपक्ष ने कहा था कि चयन समिति में सरकारी प्रतिनिधियों का दबदबा है, जिससे विपक्ष का नेता ही एकमात्र स्वतंत्र आवाज रह जाता है।
संसद ने विधेयक पारित कर दिया और नए कानून के तहत ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया।
लोकसभा में तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी ने इस पर असहमति जताई थी।
पिछले साल फरवरी में, कुमार नए कानून के तहत नियुक्त होने वाले पहले मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने।
जिस दिन कुमार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के पद पर प्रोन्नत किया गया, उसी दिन विवेक जोशी को निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया गया।
भाषा वैभव पवनेश
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