बेंगलुरु, 21 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना ने शनिवार को अदालतों में बढ़ते लंबित मामलों को कम करने के लिए एक न्यायिक सुधार आयोग के गठन का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि सभी हितधारकों में प्रणालीगत खामी की वजह से न्याय वितरण में देरी हो रही है।
वह यहां सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में ‘‘न्यायिक शासन की पुनर्कल्पना: लोकतांत्रिक न्याय के लिए संस्थानों को मजबूत करना’’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित कर रही थीं।
यहां ‘लंबित मामलों से त्वरित न्याय की ओर: भारतीय न्यायालयों में न्याय वितरण पर पुनर्विचार’ विषय पर आयोजित परिसंवाद का हिस्सा रहीं न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि इस सुधार आयोग में न केवल उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय और जिला न्यायपालिका के सदस्य होने चाहिए, बल्कि बार एसोसिएशन, अटॉर्नी जनरल, सॉलिसिटर जनरल और संस्थागत स्तर पर बार का प्रतिनिधित्व करने वाले कुछ सदस्य, जैसे कि बार अध्यक्ष, और सरकार की ओर से भी सदस्य होने चाहिए ताकि लंबित मामलों को कम करने पर अंतर-संस्थागत संवाद स्थापित किया जा सके।
उन्होंने रेखांकित किया कि विभिन्न हितधारकों के दृष्टिकोण, मुकदमे की यथास्थिति से पक्षकार के लाभ जैसे कारणों से कार्यवाही को लंबा खींचने की कोशिश होती है।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, ‘‘एक वकील या अधिवक्ता को स्थगन और सुनवाई में देरी पसंद होती है क्योंकि इससे उसे प्रति उपस्थिति और विस्तारित समयसीमा का लाभ मिलता है। सरकारी विभाग हार स्वीकार करने के बजाय अपील करके नौकरशाही संबंधी जोखिम को कम करता है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘एक न्यायाधीश, और विशेष रूप से सुनवाई अदालत का न्यायाधीश, हमेशा सावधानी से कार्य करता है क्योंकि उसे अपील में फैसले के पलटने का सामना करना पड़ता है, और इसलिए वह आक्रामक तरीके से मामलों को नियंत्रित करने के बजाय प्रक्रियात्मक सावधानी को प्राथमिकता देता है। इनमें से प्रत्येक निर्णय व्यक्तिगत रूप से तर्कसंगत है, लेकिन इससे व्यवस्था को क्या लाभ होता है? इससे केवल व्यवस्था में देरी ही होती है।’’
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने इससे निपटने के लिए कहा कि न्यायाधीशों से बेहतर आचरण की अपील करने, प्रक्रियात्मक समय-सीमा का पालन करने, अधिवक्ताओं से स्थगन न मांगने का अनुरोध करने, सरकार से मुकदमेबाजी कम करने का आग्रह करने, या अदालतों से चौबीसों घंटे काम करने और न्यायाधीशों से छुट्टी न लेने की अपेक्षा करने के बजाय, न्यायिक आयोग के माध्यम से संस्थागत हस्तक्षेप की आवश्यकता है ताकि लंबित मामलों को कम किया जा सके।
उन्होंने लंबित मामलों संबंधित अदालत के आंकड़ों में दोषपूर्ण दस्तावेजों को शामिल करने पर सवाल उठाया, और सुझाव दिया कि ऐसे मामलों को तब तक नहीं गिना जाना चाहिए जब तक कि वे प्रक्रियात्मक रूप से सुनवाई के लिए तैयार न हों।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने सरकार की भूमिका को ‘‘मुकदमेबाजी का सबसे बड़ा स्रोत’’ बताते हुए रेखांकित किया कि अधिकारी जांच से बचने के लिए अपील दायर करते हैं, यहां तक कि उन मामलों में भी जहां विवादों का निपटारा पहले ही किया जा सकता था। उन्होंने कहा कि इसके परिणामस्वरूप मामले अनावश्यक रूप से कई न्यायिक स्तरों से गुजरते हैं।
शीर्ष अदालत की न्यायाधीश ने टिप्पणी की, ‘‘सरकार सार्वजनिक रूप से न्यायिक लंबित मामलों के बारे में चिंता व्यक्त करती है, जबकि साथ ही साथ लगातार मुकदमेबाजी के माध्यम से उस लंबित मामले को और बढ़ाती है।’’
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने दावा किया कि न्यायिक क्षमता अपर्याप्त सरकारी निवेश से प्रभावित हो रहा है, जिसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी, बुनियादी ढांचे की कमी और प्रौद्योगिकी का अपर्याप्त उपयोग शामिल है।
उन्होंने समस्या का समाधान के लिए बेहतर मुकदमा प्रबंधन, अनावश्यक स्थगन पर अंकुश लगाने, प्रौद्योगिकी को अपनाने, मामलों को प्राथमिकता देने, वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को बढ़ावा देने और विशेष पीठों के निर्माण का सुझाव दिया।
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने अधिवक्ताओं से पेशेवर और नैतिक मानकों का पालन करने, वादियों से ओछी अपील से बचने और सरकार से एक व्यावहारिक मुकदमेबाजी नीति अपनाने तथा न्यायपालिका में समय पर धन और नियुक्तियां सुनिश्चित करने का की भी अपील की।
भाषा धीरज माधव
माधव