नयी दिल्ली, 17 अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि खनन माफियाओं से निपटने के लिए वैधानिक ढांचा पूरी तरह से सक्षम है, लेकिन जाहिर तौर पर प्रशासनिक अधिकारी ‘‘टालमटोल कर रहे हैं’’ और इसकी वजह समझना मुश्किल नहीं है।
राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में व्याप्त अवैध रेत खनन गतिविधियों से निपटने के लिए कई निर्देश जारी करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इस मामले से जुड़े मुद्दे केवल नियमों के अनुपालन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये पर्यावरण संरक्षण की मूल भावना को भी प्रभावित करते हैं।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि उनके द्वारा जारी किए गए निर्देश कानून के शासन को बनाए रखने और पर्यावरण की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करने के न्यायालय के संवैधानिक दायित्व को आगे बढ़ाने के लिए थे, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का एक ‘‘अभिन्न पहलू’’ है।
इसने कहा, ‘‘इसलिए, सभी संबंधित अधिकारियों का यह कर्तव्य है कि वे जिम्मेदारी, तत्परता और प्रतिबद्धता की भावना के साथ कार्य करें, ताकि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों के लिए सार्थक रूप से बना रहे।’’
उच्चतम न्यायालय ने ‘राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में अवैध रेत खनन और लुप्तप्राय जलीय वन्यजीवों के लिए खतरा’ शीर्षक वाले मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए यह आदेश पारित किया।
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य को राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य भी कहा जाता है। लगभग 5,400 वर्ग किलोमीटर में फैला यह अभयारण तीनों राज्यों का संरक्षित क्षेत्र है।
राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा रेखा के पास चंबल नदी पर स्थित यह अभयारण्य सर्वप्रथम 1978 में मध्य प्रदेश में संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया था और अब यह तीनों राज्यों द्वारा संयुक्त रूप से प्रशासित एक लंबा और संकरा अभयारण्य है।
पीठ ने कहा, ‘‘खनन माफियाओं से निपटने के लिए वैधानिक ढांचा पूरी तरह से सक्षम है, लेकिन जाहिर तौर पर प्रशासनिक अधिकारी टालमटोल कर रहे हैं, जिसके कारण स्पष्ट रूप से समझे जा सकते हैं।’’
इसने इन तीनों राज्यों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि अवैध रेत खनन के लिए अक्सर इस्तेमाल किए जाने वाले सभी मार्गों के साथ-साथ नदी के उन संवेदनशील हिस्सों में जहां इस तरह की गतिविधियां होती हैं, उच्च-रिजॉल्यूशन, वाई-फाई-सक्षम सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं।
पीठ ने अधिकारियों को केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति के परामर्श से सीसीटीवी कैमरों की स्थिति और इन्हें लगाये जाने के संबंध में एक विस्तृत मूल्यांकन करने का निर्देश दिया।
पीठ ने कहा कि अवैध खनन या उससे संबंधित गैरकानूनी गतिविधि का पता चलने पर, संबंधित अधिकारी कानून के अनुसार तुरंत कार्रवाई करने के लिए बाध्य होंगे।
इसने इन राज्यों को 11 मई तक एक विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया।
पीठ ने कहा, ‘‘रिपोर्ट में संबंधित विभागों और प्रवर्तन एजेंसियों के बीच समन्वय के लिए प्रस्तावित रूपरेखा का भी उल्लेख किया जाये, ताकि प्राप्त सूचनाओं के आधार पर कानून के अनुसार समय पर और प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।’’
इसने कहा कि संबंधित प्राधिकरणों, जिनमें इन राज्यों के राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी शामिल हैं, को नियमों का उल्लंघन करने वाले लोगों से पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति के आकलन, निर्धारण और वसूली के लिए उचित और समयबद्ध कार्रवाई शुरू करनी चाहिए।
पीठ ने कहा कि सभी चौकियों पर तैनात अधिकारियों को पर्याप्त और आधुनिक उपकरण उपलब्ध कराए जाये, जिनमें सुरक्षात्मक उपकरण, संचार उपकरण, निगरानी उपकरण और आवश्यक हथियार शामिल हैं, ताकि वे गैरकानूनी और खतरनाक अवैध खनन गतिविधियों से प्रभावी ढंग से निपटने में सक्षम हों।
इसने इन राज्यों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि ऐसे कर्मियों को उचित रूप से प्रशिक्षित और सहायता प्रदान की जाए ताकि वे ऐसी चौकियों पर उत्पन्न होने वाली किसी भी आपातकालीन स्थिति का तुरंत और कुशलतापूर्वक जवाब दे सकें।
पीठ ने कहा कि ये राज्य, एक-दूसरे के साथ घनिष्ठ समन्वय में, अवैध रेत खनन से जुड़ी गतिविधियों में लिप्त व्यक्तियों द्वारा हिंसक या सशस्त्र प्रतिरोध से जुड़ी घटनाओं से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए एक समान मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करें।
इसने इन राज्यों को निर्देश दिया कि वे 11 मई तक हलफनामे दाखिल करें, जिनमें दिए गए निर्देशों के अनुपालन में हुई प्रगति का विवरण हो।
पीठ ने साथ ही, एक विस्तृत कार्ययोजना भी प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जिसमें आगे उठाए जाने वाले कदमों और निर्देशों के प्रभावी अनुपालन के लिए तय समय-सीमा का उल्लेख हो।
भाषा
देवेंद्र पवनेश
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