महिला के विवाह से उसकी जाति नहीं बदलती: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
महिला के विवाह से उसकी जाति नहीं बदलती: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
प्रयागराज, 12 फरवरी (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक निर्णय में कहा कि जन्म से एक व्यक्ति की जाति वही रहती है, भले ही वह व्यक्ति अपना धर्म ही क्यों न बदल ले और एक महिला के विवाह से उसकी जाति नहीं बदलती।
न्यायमूर्ति अनिल कुमार ने दिनेश और आठ अन्य लोगों द्वारा दायर आपराधिक अपील इस टिप्पणी के साथ खारिज कर दी।
अलीगढ़ के विशेष न्यायाधीश (अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति अधिनियम) ने आरोपियों को तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत अपराधों के लिए समन जारी किया था, जिसे आरोपियों ने चुनौती दी थी।
एक महिला ने पुलिस को दी शिकायत में आरोप लगाया था कि इन सभी लोगों ने उस पर हमला किया और झगड़े के दौरान जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया।
इस घटना में महिला और दो अन्य लोग घायल हुए थे।
अपीलकर्ताओं ने उच्च न्यायालय में दलील दी थी कि शिकायतकर्ता जन्म से अनुसूचित जाति समुदाय से ताल्लुक रखती है और मूलरूप से पश्चिम बंगाल की निवासी है लेकिन जाट समुदाय के एक व्यक्ति के साथ विवाह के बाद उसकी जाति बदल गई है इसलिए एससी-एसटी अधिनियम के तहत अपराध के लिए समन जारी करना निराधार है।
अदालत ने 10 फरवरी को दिए आदेश में कहा, “एक व्यक्ति अपना धर्म बदल सकता है, धर्मांतरण के बाद भी उसकी जाति वहीं रहती है। इसलिए विवाह से एक व्यक्ति की जाति नहीं बदलती। अतः उक्त दलील टिकने योग्य नहीं है।”
भाषा सं राजेंद्र जितेंद्र
जितेंद्र
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