नयी दिल्ली, आठ अप्रैल (भाषा) केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने इस बात पर चिंता जताई है कि ‘‘कुछ सार्वजनिक प्राधिकार बिना सही वजह के जानकारी देने से मना करते हैं’’। उसने यह भी कहा कि सिर्फ आरटीआई अधिनियम में छूट के प्रावधान का उल्लेख करना काफ़ी नहीं है।
सीआईसी ने इस बात पर जोर दिया कि छूट का मतलब इस तरह से नहीं निकाला जाना चाहिए जिससे ‘‘अधिकार पर ही असर पड़े’’।
सोच-समझकर फैसले लेने की अहमियत पर ज़ोर देते हुए, सीआईसी ने कहा कि जानकारी देने से मना करने को सही ठहराना सार्वजनिक प्राधिकार की जिम्मेदारी है, और सिर्फ छूट के प्रावधान का जिक्र करना काफी नहीं है।
ये बातें कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के खिलाफ एक अपील पर फ़ैसला करते समय कही गईं, जहां एक आवेदक ने एक कॉर्पोरेट निकाय की जांच के दौरान दर्ज किए गए अपने ही शपथ वक्तव्य की प्रति मांगी थी।
केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी (सीपीआईओ) ने आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(एच) के तहत इस अनुरोध को स्वीकार करने से मना कर दिया। हालांकि, सीआईसी ने पाया कि ‘‘बिना किसी वजह के’’ इनकार किया गया था। उसने यह भी कहा कि इस बारे में कोई सफाई नहीं दी गई कि जानकारी देने से जांच में कैसे रुकावट आएगी।
सूचना आयुक्त पी आर रमेश ने दोहराया कि ‘‘यह दिखाने की जिम्मेदारी सार्वजनिक प्राधिकार की है कि ऐसी जानकारी देने से जांच में कैसे रुकावट आएगी’’।
उन्होंने छूट वाले प्रावधानों का नियमित इस्तेमाल नहीं करने की चेतावनी भी दी।
उन्होंने कहा कि अधिनियम के तहत जानकारी देने से मना करने के लिए ‘‘सिर्फ़ कानून के शब्दों को दोहराना काफ़ी नहीं होगा।’’
भाषा वैभव माधव
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