नाबालिग बेटी को उसके पिता को सौंपने से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

नाबालिग बेटी को उसके पिता को सौंपने से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद उच्च न्यायालय

नाबालिग बेटी को उसके पिता को सौंपने से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
Modified Date: August 28, 2026 / 01:02 am IST
Published Date: August 28, 2026 1:02 am IST

प्रयागराज, 27 अगस्त (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा छह के तहत पिता अपनी नाबालिग बेटी का स्वाभाविक संरक्षक है और जब तक यह साबित न हो जाए कि वह उसका संरक्षक बनने के योग्य नहीं है, उसे बेटी की अभिरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने प्रयागराज के अधिवक्ता अभिषेक यादव की अपील स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। यादव ने उनकी नाबालिग बेटी की अभिरक्षा उन्हें देने से इनकार करने संबंधी अधीनस्थ अदालत के आदेश को चुनौती दी थी।

अदालत ने 21 अगस्त के अपने फैसले में कहा, ‘‘हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा छह के प्रावधानों के मद्देनजर बच्चों की अभिरक्षा पर पिता का प्राथमिक अधिकार है। जब तक यह साबित न हो जाए कि वह उसका संरक्षक बनने के योग्य नहीं है, उसे नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता।’’

यादव का विवाह 2019 में हुआ था और 2022 में दंपति की एक बेटी हुई। वर्ष 2023 में उनकी पत्नी के भाई उसे मायके ले गए। वर्ष 2024 में उनकी पत्नी की मौत हो गई।

यादव की पत्नी के पिता एवं तीन भाइयों ने बच्ची की अभिरक्षा यादव को सौंपने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उन्होंने अदालत का रुख किया।

भाषा सं राजेंद्र सिम्मी

सिम्मी


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