मोदी डिग्री मामला: उच्च न्यायालय ने डीयू को आपत्ति दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का और समय दिया

मोदी डिग्री मामला: उच्च न्यायालय ने डीयू को आपत्ति दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का और समय दिया

मोदी डिग्री मामला: उच्च न्यायालय ने डीयू को आपत्ति दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का और समय दिया
Modified Date: April 27, 2026 / 08:33 pm IST
Published Date: April 27, 2026 8:33 pm IST

नयी दिल्ली, 27 अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को दिल्ली विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की स्नातक डिग्री के विवरण का खुलासा करने से इनकार करने वाले आदेश के खिलाफ अपील दाखिल करने में हुई देरी पर आपत्ति दर्ज करने के लिए दो सप्ताह का और समय दिया।

अपीलकर्ताओं के वकील ने अदालत से देरी माफ करने का आग्रह करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय को पिछली तारीख को भी आपत्ति दर्ज करने के लिए तीन सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया गया था।

हालांकि, दिल्ली विश्वविद्यालय के वकील ने कहा कि देरी पर आपत्ति दो सप्ताह के भीतर दाखिल कर दी जाएगी और अनुरोध किया कि जवाब दाखिल करने के बाद इस मामले पर फैसला किया जाए।

मुख्य न्यायाधीश डी. के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा, ‘‘प्रतिवादी के विद्वान वकील का कहना है कि देरी माफ करने की अर्जी पर आपत्ति दो सप्ताह के भीतर दाखिल कर दी जाएगी। अपीलकर्ता अगली सुनवाई की तारीख तक इसका जवाब दाखिल कर देंगे।’’

मामले की अगली सुनवाई 20 अगस्त को तय की गई है। अदालत ने 10 फरवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय को देरी पर आपत्ति दर्ज करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया था।

विश्वविद्यालय की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि ‘मामले में कुछ भी नहीं है’ और यह ‘केवल सनसनी फैलाने के लिए है’।

एक एकल न्यायाधीश के उस आदेश को चुनौती देते हुए अपील दायर की गई हैं, जिसमें केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के उस फैसले को रद्द कर दिया गया था जिसमें प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था।

खंड पीठ के समक्ष अपीलकर्ताओं में शामिल लोगों में आरटीआई कार्यकर्ता नीरज, आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह और अधिवक्ता मोहम्मद इरशाद हैं।

एकल न्यायाधीश ने 25 अगस्त, 2025 को सीआईसी के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि प्रधानमंत्री मोदी के केवल सार्वजनिक पद पर होने से उनकी सभी ‘निजी जानकारी’ सार्वजनिक नहीं हो जाती।

न्यायाधीश ने मांगी गई जानकारी में किसी भी ‘निहित जनहित’ को खारिज करते हुए कहा था कि आरटीआई अधिनियम सरकारी कामकाज में पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया था, न कि ‘सनसनीखेज खबरों को बढ़ावा देने के लिए’।

नीरज द्वारा दायर आरटीआई आवेदन के बाद, सीआईसी ने 21 दिसंबर, 2016 को 1978 में बीए परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले सभी छात्रों के रिकॉर्ड की जांच की अनुमति दी थी। वर्ष 1978 में ही प्रधानमंत्री मोदी ने भी यह परीक्षा उत्तीर्ण की थी।

एकल न्यायाधीश ने छह याचिकाओं पर संयुक्त आदेश पारित किया था, जिनमें दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा दायर याचिका भी शामिल थी।

इन याचिकाओं में सीआईसी के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत विश्वविद्यालय को मोदी की स्नातक डिग्री से संबंधित विवरण सार्वजनिक करने का निर्देश दिया गया था।

दिल्ली विश्वविद्यालय के वकील ने सीआईसी के आदेश को रद्द करने की मांग की थी, लेकिन कहा था कि विश्वविद्यालय को अपने रिकॉर्ड अदालत को दिखाने में कोई आपत्ति नहीं है।

एकल न्यायाधीश ने राय दी थी कि शैक्षणिक योग्यताएं किसी भी सार्वजनिक पद को धारण करने या आधिकारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए किसी भी वैधानिक आवश्यकता के दायरे में नहीं आती हैं।

उच्च न्यायालय ने सीआईसी के उस आदेश को भी रद्द कर दिया था जिसमें सीबीएसई को पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी से जुड़े कक्षा 10 और 12 के रिकॉर्ड की प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।

भाषा संतोष माधव

माधव


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