दिल्ली में फ्लाईओवर के नीचे स्थित मुगलकालीन सराय को किया जा सकता है संरक्षित

दिल्ली में फ्लाईओवर के नीचे स्थित मुगलकालीन सराय को किया जा सकता है संरक्षित

दिल्ली में फ्लाईओवर के नीचे स्थित मुगलकालीन सराय को किया जा सकता है संरक्षित
Modified Date: August 22, 2026 / 08:06 pm IST
Published Date: August 22, 2026 8:06 pm IST

नयी दिल्ली, 22 अगस्त (भाषा) दिल्ली के मथुरा रोड पर मोदी मिल फ्लाईओवर के नीचे यातायात और कंक्रीट के बीच, एक भूली-बिसरी इमारत के खंडहर में 18वीं सदी की एक सराय (मुसाफिरखाना) के अवशेष हो सकते हैं, जिसे उस पुर्तगाली महिला ने बनवाया था, जिसका कभी मुगल दरबार में बहुत खास रुतबा था।

इतने ऐतिहासिक महत्व वाली इमारत के लिए यह एक अप्रत्याशित स्थान है।

फ्लाईओवर के नीचे लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) की देखरेख वाले हरित क्षेत्र में दीवारों के कुछ हिस्से, मेहराबदार दरवाजा, पुरानी इमारत के टुकड़े और एक कुआं (जिसमें अब भी पानी है)- बस यही चीजें ‘सराय जुलियाना’ की बची-खुची निशानियां हो सकती हैं। यह 18वीं सदी में यात्रियों के ठहरने के लिए ‘डोना जुलियाना डायस दा कोस्टा’ ने बनवाया था।

दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के धरोहर प्रकोष्ठ के सदस्य सचिव डॉ. अकील अहमद ने इन खंडहरों की पहचान सराय के संभावित अवशेषों के तौर पर की और कहा कि निगम इस ढांचे को धरोहर स्थल के तौर पर अधिसूचित करने की योजना बना रहा है।

इस तरह की मान्यता उस स्मारक को आधिकारिक दर्जा दिला सकती है, जिसका नाम दक्षिण-पूर्वी दिल्ली के ओखला इलाके के शहरी गांव ‘सराय जुलेना’ में तो बचा रहा, लेकिन माना जाता है कि वह ‘सराय’ ही गायब हो गई है।

ऐतिहासिक शोध से पता चलता है कि जुलियाना ने 1720 में मुहम्मद शाह ‘रंगीला’ के शासनकाल के दौरान ओखला में यूरोपीय यात्रियों के लिए आराम करने की जगह के तौर पर एक सराय बनवाई थी।

यह जानकारी ‘जुलियाना नामा’ किताब में मिलती है, जिसे राष्ट्रीय संग्रहालय के पूर्व निदेशक रघुराज सिंह चौहान और आर्काइविस्ट मधुकर तिवारी ने लिखा है। उन्होंने फ्रेंच, पुर्तगाली, फ़ारसी और उर्दू स्रोतों के ज़रिये जुलियाना के जीवन के बारे में जानकारी जुटाई थी।

इस पहेली का पहला हिस्सा यही जगह है।

मथुरा रोड के शहरी राजमार्ग बनने से बहुत पहले, यह उत्तर-पश्चिमी सीमा को मुगल साम्राज्य के मुख्य इलाके से जोड़ने वाले जमीनी रास्ते का हिस्सा था। शेरशाह सूरी के समय में विकसित यह रास्ता ‘सड़क-ए-आज़म’ या ‘ग्रेट रोड’ के नाम से जाना जाता था। यह पेशावर, लाहौर, दिल्ली और आगरा से होते हुए बंगाल तक जाता था और बाद में यही ‘ग्रैंड ट्रंक रोड’ का आधार बना।

भाषा राजकुमार सुरेश

सुरेश


लेखक के बारे में