(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, दो सितंबर (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने फरवरी 2020 के दंगों के दौरान खुफिया ब्यूरो (आईबी) के कर्मचारी अंकित शर्मा की हत्या के मामले में अपनी दोषसिद्धि और उम्रकैद की सजा को चुनौती देने वाली आम आदमी पार्टी (आप) के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन की याचिका पर बुधवार को पुलिस से जवाब मांगा।
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति विकास महाजन की पीठ ने हुसैन की अपील को विचारार्थ स्वीकार कर लिया और इसे दो दिसंबर को सुनवाई के लिए अन्य संबंधित अपीलों के साथ सूचीबद्ध किया।
अदालत ने जेल अधिकारियों को दोषी का विवरण रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया और मामले में अधीनस्थ अदालत के रिकॉर्ड भी तलब किए।
हुसैन ने इस मामले में उन्हें दोषी ठहराने और सजा सुनाने संबंधी अधीनस्थ अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए कहा कि जांच का उद्देश्य जनता के गुस्से को शांत करने के लिए उन्हें फंसाना था।
दिल्ली पुलिस के वकील ने कहा कि राज्य सरकार हुसैन की अपील समेत सभी अपीलों पर एक साथ बहस करेगी।
पीठ ने कहा, ‘‘एक ही फैसले से जुड़ी सभी अपीलों पर दो दिसंबर को सुनवाई होगी। हमें हर किसी की भूमिका का आकलन करना है। हम सबकी भूमिका का आकलन अलग-अलग करेंगे लेकिन सुनवाई एक साथ करेंगे। एक साथ सुनवाई करने से अदालत का समय बचेगा।’’
अभियोजन पक्ष के अनुसार, 26 फरवरी 2020 को शिकायतकर्ता रविंदर कुमार ने दयालपुर थाने के अधिकारियों को सूचित किया कि खुफिया ब्यूरो (आईबी) में तैनात उनका बेटा अंकित शर्मा 25 फरवरी 2020 से लापता है।
बाद में उन्हें कुछ स्थानीय लोगों से पता चला कि एक व्यक्ति की हत्या करने के बाद उसका शव चांद बाग पुलिया की मस्जिद से खजूरी खास नाले में फेंक दिया गया है।
अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि शर्मा का शव खजूरी खास नाले से बरामद किया गया और उनके शरीर पर चोट के 51 निशान थे।
अधीनस्थ अदालत ने 31 जुलाई को हुसैन और चार अन्य दोषियों – नाजिम, कासिम, जावेद और अनस को आईबी अधिकारी की हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अदालत ने कहा कि यह मामला ‘‘दुर्लभतम से दुर्लभ’’ अपराध की श्रेणी में नहीं आता जिसके लिए मौत की सजा दी जा सके।
हुसैन ने अपनी अपील में दावा किया कि ‘‘अपीलकर्ता के खिलाफ जांच शुरुआत से ही पक्षपातपूर्ण’’ रही और जनता के गुस्से को शांत करने के लिए उन्हें फंसाने के उद्देश्य से ये जांच की गई। उन्होंने कहा कि प्राथमिकी की तारीख और समय गलत डाले गए थे। साथ ही छह मार्च, 2020 तक यानी दूसरे मामले में उनकी गिरफ्तारी होने तक कोई ठोस जांच नहीं की गई’’।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मामले में गवाह ‘‘तैयार किए गए’’ और असली चश्मदीदों के बयानों में हेरफेर की गई जबकि असली दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई।
अधीनस्थ अदालत ने 13 जुलाई को शर्मा की हत्या को लेकर सभी पांच आरोपियों को दोषी ठहराया था। अदालत ने माना कि वे हथियारों से लैस एक गैर-कानूनी भीड़ का हिस्सा थे जिसने सांप्रदायिक हिंसा के दौरान आईबी अधिकारी पर बेरहमी से हमला किया और उनकी हत्या कर दी।
हुसैन ने अपनी याचिका में निचली अदालत के 13 जुलाई के दोषसिद्धि आदेश और 31 जुलाई के सजा सुनाए जाने के आदेश को रद्द करने का अनुरोध किया है। उन्होंने दलील दी कि अधीनस्थ अदालत ने पूरी तरह अविश्वसनीय गवाहों के बयानों पर भरोसा किया और उन लोगों के बयानों को आधार बनाया जिन्होंने घटना को देखा ही नहीं था। उन्होंने आरोप लगाया कि अदालत ने शिकायत में कथित हेरफेर समेत जांच की खामियों को नजरअंदाज किया जिसके आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
हुसैन को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 149 (अवैध जमावड़ा) को पढ़ते हुए आईपीसी की धाराओं 302 (हत्या), 365 (किसी व्यक्ति को गुप्त और गलत तरीके से बंधक बनाने के इरादे से अपहरण या अगवा करना), 147 (दंगा करना), 148 (घातक हथियार से लैस होकर दंगा करना), 153ए (दुश्मनी को बढ़ावा देना) और 188 (लोक सेवक के आदेश का पालन नहीं करना) के तहत दोषी ठहराया गया था।
अभियोजन पक्ष ने सभी पांच आरोपियों के लिए मौत की सजा का अनुरोध करते हुए कहा था कि शर्मा पर लगातार हमला करते समय वे ‘‘जानवरों के स्तर’’ तक गिर गए थे।
अधीनस्थ अदालत ने उन्हें मृत्युदंड नहीं दिया और कहा कि अभियोजन यह साबित कर पाने में विफल रहा कि आरोपियों का स्वभाव इतना हिंसक या आपराधिक प्रवृत्ति का था कि जेल में रहने के बावजूद उनका समाज के लिए खतरा बने रहना तय था।
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 24 फरवरी 2020 को सांप्रदायिक झड़पें हुई थीं। नागरिकता कानून के समर्थकों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प के बाद भड़की हिंसा में कम से कम 53 लोगों की मौत हो गई थी और कई लोग घायल हो गए थे।
भाषा सुरभि मनीषा
मनीषा