देहरादून, 13 मार्च (भाषा) भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार गंगा को साफ करने के उद्देश्य से एक दशक से भी अधिक समय पहले शुरू किया गया केंद्र का महत्वपूर्ण ‘नमामि गंगे’ कार्यक्रम उत्तराखंड की कार्यान्वयन एजेंसियों की विफलता के कारण वांछित परिणाम नहीं दे पाया। प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में जारी बजट सत्र के दौरान पेश की गयी इस रिपोर्ट में सीएजी ने कहा कि 2018 से 2023 के दौरान जब कार्यक्रम का प्रदर्शन ऑडिट किया गया था, तब केंद्र ने राज्य की भाजपा सरकार के तहत नमामि गंगा परियोजना के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए 1,000 करोड़ रुपये की धनराशि उपलब्ध कराई थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्र सरकार के वित्तपोषित वाली इस परियोजना में अवजल शोधन संयंत्र (एसटीपी) के दोषपूर्ण डिजाइन, अवसंरचना का खराब रखरखाव, गंगा में पानी छोड़ने वाले नालों की टैपिंग न होना, नदियों और छोटी जलधाराओं के पास कूड़ा फेंके जाने जैसी कई अनियमितताएं पाई गई हैं।
कैग ने पाया कि गंगा के लिए वानिकी हस्तक्षेप (एफआईजी) संबंधी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) में 885.91 करोड़ रुपयेपये का बजटीय प्रावधान और 54,855.43 हेक्टेयर वृक्षारोपण शामिल था लेकिन इसके विपरीत केवल 144.27 करोड़ रुपये यानी 16 प्रतिशत ही खर्च किया गया जिसके परिणामस्वरूप भौतिक प्रगति धीमी रही और गंगा पुनरुद्धार से संबंधित विशिष्ट उद्देश्यों को पूरा करने में यह योजना विफल रही।
कैग द्वारा 2023 में निरीक्षण किए गए 44 एसटीपी में से केवल तीन से पांच ही राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के मानदंडों के अनुरूप पाए गए जबकि छह से 12 ही पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय(एमओईएफ) और अन्य मानदंडों के अनुरूप पाए गए। रिपोर्ट में कहा गया है कि इससे व्यापक गैर-अनुपालन और निम्न स्तर के सीवेज उपचार का पता चलता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, इसके कारण नमामि गंगे परियोजना को भारी नुकसान हुआ।
निरीक्षण किए गए 44 एसटीपी में से अधिकांश में 2023 की तीनों तिमाहियों में एमओईएफ और एनजीटी, दोनों के मानदंडों का घोर गैर अनुपालन दिखा़, जहां जैव रासायनिक ऑक्सीजन, टोटल सस्पेंडेड सॉलिड (टीएसएस) और ‘फीकल कोलीफॉर्म’ से अनुमेय सीमा से कहीं अधिक है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह गंभीर रूप से निम्न स्तर के सीवेज उपचार को दर्शाता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी और उत्तरकाशी जिलों में 11 स्थानों पर स्थानीय जरूरत या सांस्कृतिक तौर-तरीकों का आकलन किए बिना श्मशान घाटों का निर्माण किया गया जिनका न तो उपयोग हो रहा है और न ही रखरखाव जबकि नदियों के किनारों पर चिताएं जलाई जा रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, 2011 में तत्कालीन राज्य नदी संरक्षण प्राधिकरण द्वारा 2020 तक सभी अनुपचारित शहरी अपशिष्ट जल और औद्योगिक अपशिष्टों को गंगा नदी में प्रवेश करने से रोकने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था लेकिन इसके बावजूद, राज्य सरकार के अधिकारियों ने 13 साल बाद भी राज्य नदी बेसिन प्रबंधन योजना तैयार नहीं की।
रिपोर्ट में कहा गया है कि गंगा बेसिन के किसी भी जिले जैसे उत्तरकाशी, टिहरी, चमोली, रुद्रप्रयाग, पौड़ी, देहरादून और हरिद्वार में जिला गंगा योजनाएं तैयार नहीं की गईं, जिसके परिणामस्वरूप सीवरेज संबंधी मुद्दों का खराब प्रबंधन हुआ और 2020 के लक्ष्य को प्राप्त करने में विफलता मिली।
रिपोर्ट के अनुसार नमामि गंगा के प्रमुख लक्ष्यों में से एक सतत अवसंरचना की योजना में स्थानीय समुदायों को शामिल करना था। हालांकि, एक ऑडिट में पाया गया कि राज्य सरकार के अधिकारियों और कार्यान्वयन एजेंसियों ने योजना में स्थानीय निवासियों को शामिल नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप सीवरेज अवसंरचना का अनुचित उपयोग हुआ या उसका उपयोग ही नहीं हुआ ।
रिपोर्ट में कहा गया है कि राज्य सरकार ने गंगा के तटवर्ती नगरों में स्वच्छता की जिम्मेदारी होने के बावजूद, वहां सीवेज बुनियादी ढांचे पर अपने संसाधनों से धन खर्च नहीं किया।
रिपोर्ट के अनुसार राज्य ने न तो एसटीपी बनवाए और न ही घरों में सीवर कनेक्शन दिए गए जबकि जर्मन विकास बैंक (केएफडब्ल्यू) द्वारा वित्त पोषित परियोजनाओं जैसे प्रयास केवल हरिद्वार और ऋषिकेश तक ही सीमित हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक गंगा के तटवर्ती सात शहरों में निर्मित 21 एसटीपी (नंदप्रयाग में दो, कर्णप्रयाग में पांच, रुपयेद्रप्रयाग में छह, कीर्तिनगर में दो, चमोली में एक, श्रीनगर और श्रीकोट में तीन-तीन एसटीपी और जोशीमठ में दो एसटीपी) से किसी घर को नहीं जोड़ा गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑडिट के दौरान घरों में सीवेज की आंशिक कनेक्टिविटी देखी गई और हरिद्वार, ऋषिकेश, श्रीनगर, उत्तरकाशी और चमोली में क्रमशः केवल 69 प्रतिशत, 29 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, नौ प्रतिशत और छह प्रतिशत घर ही एसटीपी से जुड़े हुए थे और इसका कारण सीवर लाइनों की कमी और अपर्याप्त उपचार क्षमता थी ।
रिपोर्ट के अनुसार एक प्रमुख कार्यान्वयन एजेंसी उत्तराखंड पेयजल निगम राज्य में कोई भी सह-शोधन संयंत्र स्थापित नहीं कर पाया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि हरिद्वार और ऋषिकेश के एसटीपी क्षमता से अधिक सीवेज यानी ओवरलोड की समस्या का सामना कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, हरिद्वार के 68 एमएलडी क्षमता वाले एसटीपी में कई बार 84 एमएलडी तक सीवेज आ चुका है, जबकि चोरपानी (ऋषिकेश) के पांच एमएलडी क्षमता वाले एसटीपी में कभी-कभी 17 एमएलडी तक सीवेज आ जाता है।
इसी प्रकार, देवप्रयाग और जोशीमठ में एसटीपी अपर्याप्त सीवेज प्रवाह के कारण अपनी क्षमता से काफी कम काम कर पा रहे हैं। इन समस्याओं के कारण एसटीपी का इच्छित उद्देश्य विफल हो गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऋषिकेश में ढालवाला, कीर्तिनगर, रुपयेद्रप्रयाग, श्रीकोट, गोपेश्वर और कर्णप्रयाग में स्थित 12 एसटीपी गंगा में अनुपचारित सीवेज बहा रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार नमामि गंगे के तहत 44 एसटीपी में से आठ एसटीपी चार साल से भी अधिक समय से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वैध सहमति और आज्ञा के काम कर रहे हैं जो कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करने के साथ साथ पर्यावरणीय जोखिम पैदा कर रहे हैं।
निर्माण एजेंसी उत्तराखंड पेयजल निगम द्वारा निर्माण के कई वर्षों बाद भी 18 एसटीपी रखरखाव एजेंसी यानी उत्तराखंड जल संस्थान को नहीं सौंपे गए हैं।
. रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रावधानों के अनुसार अनिवार्य सुरक्षा ऑडिट न किए जाने के कारण, रुद्रप्रयाग में स्थित 75 किलोलीटर क्षमता वाला एक एसटीपी 2021 में भूस्खलन से नष्ट हो गया, जिससे 0.88 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ । इसके अलावा, चमोली एसटीपी में 2023 में हुई गंभीर दुर्घटना के कारण 28 लोगों को बिजली का करंट लग गया जिसमें 16 व्यक्तियों की मृत्यु हो गयी ।
भाषा दीप्ति
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