अस्थमा से बचाव के लिए नाक की एलर्जी के मरीज़ धूल व पालतू जानवरों से बनाएं दूरी: विशेषज्ञ‘

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अस्थमा से बचाव के लिए नाक की एलर्जी के मरीज़ धूल व पालतू जानवरों से बनाएं दूरी: विशेषज्ञ‘

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  • Publish Date - May 5, 2026 / 01:42 PM IST,
    Updated On - May 5, 2026 / 01:42 PM IST

(अहमद नोमान)

नयी दिल्ली, पांच मई (भाषा) स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने मंगलवार को कहा कि ‘एलर्जिक राइनाइटिस’ (नाक की एलर्जी) या ‘ब्रोंकाइटिस’ से पीड़ित लोगों में अस्थमा होने का खतरा अधिक होता है। ऐसे लोगों को धूल, पराग और पालतू जानवरों जैसे एलर्जी पैदा करने वाले कारकों से दूरी बनाने की सलाह दी गई है, ताकि अस्थमा के जोखिम को कम किया जा सके।

विशेषज्ञों के अनुसार, ‘एलर्जिक’ राइनाइटिस और अस्थमा आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं और इन्हें अक्सर “वन एयरवे डिजीज” कहा जाता है। इसका मतलब है कि नाक और फेफड़ों की सांस की नलियां एक ही प्रणाली का हिस्सा हैं, इसलिए नाक में होने वाली सूजन फेफड़ों को भी प्रभावित कर सकती है और दोनों बीमारियां साथ-साथ देखी जा सकती हैं।

डॉक्टरों ने यह भी कहा कि बच्चों में उम्र बढ़ने के साथ अस्थमा के लक्षण कम हो जाते हैं या लगभग खत्म हो जाते हैं, लेकिन आगाह किया कि बीमारी को पूरी तरह खत्म मान लेना भविष्य में जटिलताएं पैदा कर सकता है।

उनके मुताबिक, ‘एलर्जिक राइनाइटिस’ नाक की एलर्जी को कहते हैं जिसमें व्यक्ति के धूल, पराग, धुआं, पालतू जानवरों के बाल या किसी खास चीज़ के संपर्क में आने पर शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली ज़रूरत से ज़्यादा प्रतिक्रिया करती है। इससे नाक के अंदर सूजन हो जाती है और एलर्जी के लक्षण शुरू हो जाते हैं, जिसमें बार-बार छींक आना, नाक बहना, नाक बंद रहना, नाक, गले या आंखों में खुजली आदि प्रमुख लक्षण होते हैं।

मई के पहले मंगलवार को मनाए जाने वाले विश्व अस्थमा दिवस के मौके पर निजी अस्पताल में फेफड़ों से संबंधित बीमारी की वरिष्ठ डॉक्टर प्रीतपाल कौर ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, “ अस्थमा लंबे समय तक चलने वाली सांस की बीमारी है, जिसमें सांस की नलियां सूज जाती हैं और सिकुड़ जाती हैं। इसके लक्षण सांस फूलना, सांस लेने पर सीटी जैसी आवाज आना, खांसी और सीने में जकड़न आदि होते हैं।”

अस्थमा का कारण एलर्जी होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में एलर्जी को नियंत्रित करना बहुत जरूरी है और एलर्जी के लक्षण भड़काने वाली चीज़ों जैसे धूल, पराग, पालतू जानवरों से दूरी बनाना पहला कदम है।

वहीं, अन्य अस्पताल में पल्मोनोलॉजी, रेस्पिरेटरी और स्लीप मेडिसिन के एसोसिएट निदेशक डॉ. शिवांशु राज गोयल ने एलर्जी को अस्थमा का आम कारण बताते हुए कहा कि यह और वजहों से भी हो सकता है जिसमें अनुवांशिक कारण के साथ-साथ संक्रमण, धूम्रपान, मौसम में बदलाव, कसरत व तनाव भी शामिल है।

यह पूछने पर कि ‘एलर्जिक राइनाइटिस’ या ब्रोंकाइटिस से पीड़ित लोगों में क्या अस्थमा का खतरा होता है तो अन्य श्वांस रोग विशेषज्ञ डॉ. सौम्या शिशिर अग्रवाल ने बताया कि एलर्जिक राइनाटिस और अस्थमा आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं और इन्हें अक्सर ‘वन एयरवे डीज़ीज़’ कहा जाता है, यानी अगर नाक में सूजन है, तो वही सूजन नीचे फेफड़ों तक भी असर डाल सकती है इसलिए दोनों बीमारियां अक्सर साथ-साथ दिखती हैं।

हालांकि डॉक्टर अग्रवाल ने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि ‘एलर्जिक राइनाटिस’ से पीड़ित हर व्यक्ति को अस्थमा हो ही जाए, लेकिन यह खतरा उन लोगों में ज्यादा होता है जिन लोगों के परिवार में किसी को अस्थमा हो या उन्हें सांस में अक्सर सीटी जैसी आवाज आती हो।

इसी सवाल पर डॉक्टर कौर ने कहा कि खासकर बच्चों में अगर नाक की एलर्जी बार-बार होती है, तो यह धीरे-धीरे सांस की नली के निचले हिस्से को लंबे वक्त में प्रभावित कर सकती है जिसे “एलर्जिक मार्च” कहा जाता है। लिहाज़ा शुरुआत में ही एलर्जी को नियंत्रित करना जरूरी है।

केंद्र सरकार ने पिछले साल दिसंबर में बताया था कि नए सरकारी आंकड़ों और आईसीएमआर के शोध से पता चलता है कि 2022 और 2024 के बीच, दिल्ली के छह प्रमुख केंद्रीय अस्पतालों में तीव्र श्वसन संबंधी बीमारी (एआरआई) की वजह से 2,04,758 मरीज आए। इनमें से लगभग 30,420 मरीजों, यानी लगभग 15 प्रतिशत को अस्पताल में भर्ती करने की आवश्यकता पड़ी।

अन्य निजी अस्पताल में श्वास रोग संबंधी चिकित्सा के निदेशक डॉ. अनिमेष आर्य ने अस्थमा के पूरी तरह से ठीक होने के सवाल पर कहा, “अस्थमा का पूर्ण उपचार हमेशा संभव नहीं होता, लेकिन इसे बहुत अच्छे से नियंत्रित किया जा सकता है। सही दवाओं, इनहेलर और ट्रिगर से बचाव के साथ मरीज पूरी तरह सामान्य जीवन जी सकता है।”

यह पूछने पर कि यह कितना सही है कि बच्चों में अस्थमा उम्र के साथ ठीक हो जाता है, उन्होंने कहा, “यह पूरी तरह मिथक नहीं है, लेकिन हर बच्चे पर लागू भी नहीं होता। कुछ बच्चों में उम्र बढ़ने के साथ अस्थमा के लक्षण कम हो जाते हैं या लगभग खत्म हो जाते हैं, लेकिन कई बच्चों में यह बीमारी आगे भी बनी रह सकती है। इसलिए यह मानकर इलाज बंद नहीं करना चाहिए कि बच्चा बड़ा होकर ठीक हो जाएगा।”

भाषा नोमान नोमान मनीषा

मनीषा