एनसीईआरटी पुस्तक विवाद: आईआईटी-गांधीनगर मिशेल डैनिनो की अतिथि प्रोफेसर की भूमिका की समीक्षा करेगा

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एनसीईआरटी पुस्तक विवाद: आईआईटी-गांधीनगर मिशेल डैनिनो की अतिथि प्रोफेसर की भूमिका की समीक्षा करेगा

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  • Publish Date - March 12, 2026 / 04:30 PM IST,
    Updated On - March 12, 2026 / 04:30 PM IST

नयी दिल्ली, 12 मार्च (भाषा) भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी)-गांधीनगर की स्थायी समिति मिशेल डैनिनो की अतिथि प्रोफेसर के रूप में भूमिका की समीक्षा करेगी। अधिकारियों ने यह जानकारी दी।

उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को निर्देश दिया था कि केंद्र और सभी राज्य सरकारें राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब में विवादास्पद अध्याय तैयार करने में शामिल तीन विशेषज्ञों से अपना संबंध तोड़ लें।

शीर्ष अदालत ने इस अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार को लेकर कथित “आपत्तिजनक” सामग्री शामिल किये जाने को लेकर यह सख्ती बरती थी। उच्चतम न्यायालय की पीठ को बताया गया था कि यह अध्याय पद्म पुरस्कार से सम्मानित प्रोफेसर मिशेल डैनिनो की अध्यक्षता में बनी टीम द्वारा तैयार किया गया था, जिसमें सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्न कुमार सदस्य के रूप में शामिल थे।

घटनाक्रम से परिचित एक वरिष्ठ अधिकारी ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के मद्देनजर एक स्थायी समिति डैनिनो की नियुक्ति की समीक्षा करेगी और इसके बाद निर्णय लिया जायेगा।’’

आईआईटी-गांधीनगर के साथ डैनिनो का जुड़ाव 2011 से है, जब उन्होंने संस्थान में अतिथि प्रोफेसर के रूप में कार्यभार संभाला था। फ्रांस में जन्मे भारतीय नागरिक डैनिनो को साहित्य और शिक्षा में उनके योगदान के लिए 2017 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।

वह राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी), 2020 के अनुसार नया पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए केंद्र की समिति के सदस्य भी थे।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था, “प्रारंभ में हमारे पास यह संदेह करने का कोई कारण नहीं है कि प्रोफेसर मिशेल डैनिनो और उनके सहयोगी सुपर्णा दिवाकर तथा आलोक प्रसन्न कुमार को भारतीय न्यायपालिका के बारे में उचित और पर्याप्त जानकारी नहीं है और/या उन्होंने जानबूझकर तथा सोच-समझकर तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत किया है, ताकि आठवीं कक्षा के छात्रों के सामने भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश की जा सके…।”

उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि उसे ऐसा कोई कारण नहीं दिखाई देता कि इन व्यक्तियों को किसी भी रूप में पाठ्यक्रम तैयार करने या आने वाली पीढ़ी के बच्चों के लिए पाठ्यपुस्तकों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया से जोड़ा जाए।

भाषा

देवेंद्र पवनेश

पवनेश