एनसीडब्ल्यू अध्यक्ष का महिलाओं के साथ जघन्य अपराधों के मामलों की समयबद्ध सुनवाई का आह्वान
एनसीडब्ल्यू अध्यक्ष का महिलाओं के साथ जघन्य अपराधों के मामलों की समयबद्ध सुनवाई का आह्वान
बेंगलुरु, नौ अगस्त (भाषा) राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की अध्यक्ष विजया के रहाटकर ने रविवार को महिलाओं के साथ गंभीर अपराधों के मामलों की तय समय-सीमा के भीतर सुनवाई का आह्वान किया और अदालतों से अपील की कि वे यह सुनिश्चित करें कि पीड़िताओं एवं उनके परिवारों को पहले से प्रदत्त राहत के लिए बार-बार न्यायपालिका के पास न जाना पड़े।
उन्होंने यहां दक्षिण क्षेत्र में ‘महिलाओं के लिए न्याय’ विषयक सम्मेलन के समापन समारोह में अपने संबोधन में 2022 के श्रद्धा वालकर हत्याकांड का ज़िक्र किया और इसे इस बात का ‘दर्दनाक उदाहरण’ बताया कि कैसे न्याय मिलने में सालों की देरी हो सकती है।
उस युवती की बेरहमी से की गयी हत्या को याद करते हुए उन्होंने बताया कि उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए थे, उसे रेफ्रिजरेटर में रखा गया था और बाद में दिल्ली की अलग-अलग सड़कों पर फेंक दिया गया था।
एनसीडब्ल्यू अध्यक्ष ने कहा, ‘‘पीड़िता के पिता की मौत पिछले साल फरवरी में अपनी बेटी के लिए न्याय की बाट जोहते हुए हो गई। वह न्याय पाए बिना ही गुज़र गए। श्रद्धा की दादी का भी निधन हो गया।’’
उन्होंने कहा कि पीड़िता की मौसी हर सुनवाई के लिए मुंबई से दिल्ली आती हैं, लेकिन सुनवाई बार-बार टलती रही है।
उन्होंने कहा कि इसकी वजह आरोपी की दंत और मनोविकार चिकित्सा और उसकी परीक्षाएं रही हैं जो ‘समाजशास्त्र’ में स्नातोकोत्तर डिग्री कर रहा है।
रहाटकर ने कहा, ‘‘अब देश के नागरिक यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या बेरहमी से हत्या करने वाले आरोपी की समाजशास्त्र की परीक्षा या दंत चिकित्सा इतना ज़रूरी है कि चार साल तक न्याय नहीं मिल पा रहा है? ऐसे मामलों में हमें संवेदनशील होने और आत्म-मंथन करने की ज़रूरत है। क्या हम सच में पीड़िता और उसके परिवार को न्याय दिला रहे हैं? न्याय दिलाना जरूरी है, लेकिन नागरिकों के मन में यह भरोसा जगाना ज़्यादा ज़रूरी है कि न्याय हो रहा है।’’
एनसीडब्ल्यू अध्यक्ष ने महाराष्ट्र के नसरापुर के एक और हालिया मामले का ज़िक्र किया, जहां 65 साल के एक आदतन अपराधी ने तीन साल की बच्ची पर बेरहमी से यौन हमला किया और उसकी हत्या कर दी।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं इस बात की तारीफ करती हूं कि पुलिस और न्यायपालिका ने इस मामले में बहुत असरदार ढंग से काम किया। घटना के 16 दिनों के अंदर ही 1,200 पन्नों का आरोपपत्र दाखिल किया गया और पुणे की एक विशेष पोक्सो अदालत ने इस मामले की त्वरित सुनवाई की। अदालत ने अपराध को ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ श्रेणी में मानते हुए, सिर्फ़ 56 दिनों में उसे फांसी की सज़ा सुनाई।’’
रहाटकर ने कहा कि ये दोनों मामले अलग-अलग उदाहरण हैं जो दिखाते हैं कि अगर जांच एजेंसियां और न्यायपालिका न्याय दिलाने का फैसला करें, तो कुछ ही दिनों में न्याय मिल सकता है।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं आपसे गुजारिश करना चाहती हूं कि कम से कम महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराधों के मामलों में सुनवाई कुछ दिनों में नहीं तो कम से कम कुछ महीनों में पूरा हो जाना चाहिए ताकि पीड़िता और उसके परिवार को लगे कि समय पर न्याय मिला है।’’
उन्होंने कहा कि न्यायपालिका ही हर किसी के लिए आखिरी उम्मीद होती है तथा कई महिलाओं के लिए तो यह और भी मुश्किल होता है। उन्होंने कहा कि न्याय की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जिससे पीड़िताओं को सहारा, सम्मान और सुरक्षा का एहसास हो, न कि उन्हें डराया-धमकाया जाए या परेशान किया जाए।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि अदालतों को समय-समय पर यह देखना चाहिए कि उनके आदेशों को ठीक से लागू किया जा रहा है या नहीं, क्योंकि किसी महिला का संघर्ष जरूरी नहीं कि अदालत से गुज़ारा-भत्ता मिलने पर ही खत्म हो जाए।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं अदालतों से अपील करती हूं कि वे संपत्ति ज़ब्त करने और अदालत की अवमानना से जुड़े अपने मौजूदा अधिकारों का सक्रिय रूप से इस्तेमाल करें, ताकि किसी महिला को अपने पक्ष में पहले से पारित गुज़ारे-भत्ते के आदेश को लागू करवाने के लिए बार-बार अदालत न आना पड़े।’’
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश लिसा गिल ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ ‘डिजिटल’ हिंसा का जवाब ‘तुरंत’ दिया जाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि डिजिटल दुनिया, स्क्रीन के पीछे छिपने वाले अपराधियों के लिए सुरक्षित जगह नहीं बननी चाहिए।
उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश वी. मोहना ने कहा कि महिलाओं के लिए न्याय का दायरा सिर्फ़ सुरक्षा तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उन्हें समानता, सम्मान, स्वायत्तता और आज़ादी दिलाने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
भाषा
राजकुमार नरेश
नरेश

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