(शीर्षक में बदलाव के साथ)
नयी दिल्ली, 29 जुलाई (भाषा) राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (एनएमसी) ने एमबीबीएस पाठ्यक्रम में दाखिले के लिए मानक दिव्यांगता वाले व्यक्तियों (पीडब्ल्यूबीडी) के आकलन को लेकर नये दिशानिर्देश जारी किए हैं।
नये नियमों के तहत दाखिले से संबंधित दिव्यांगता प्रमाणपत्र को अब ‘पात्रता प्रमाणपत्र’ के नाम से जाना जाएगा। साथ ही, देशभर में निर्दिष्ट आकलन केंद्रों की संख्या 16 से बढ़ाकर 61 कर दी गई है।
एनएमसी के स्नातक चिकित्सा शिक्षा बोर्ड (यूजीएमईबी) की ओर से जारी ‘एमबीबीएस प्रवेश-2026 के लिए पीडब्ल्यूबीडी आकलन दिशानिर्देश’ ने दिव्यांग अभ्यर्थियों के मूल्यांकन से जुड़े पुराने प्रावधानों का स्थान ले लिया है।
दिशानिर्देशों के अनुसार, एमबीबीएस में दाखिले के लिए निर्दिष्ट चिकित्सा आकलन बोर्डों द्वारा जारी प्रमाणपत्र को भले ही आमतौर पर दिव्यांगता प्रमाणपत्र कहा जाता रहा हो, लेकिन अब इसे पात्रता प्रमाणपत्र कहा जाएगा। इसका उद्देश्य केवल दिव्यांग होना या उसके प्रतिशत को बताना नहीं, बल्कि अभ्यर्थी के कामकाज करने की क्षमता के आधार पर यह तय करना होगा कि वह चिकित्सा शिक्षा के लिए पात्र है या नहीं।
दिशानिर्देशों में कहा गया है कि स्वास्थ्य सेवा महानिदेशालय (डीजीएचएस), स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने देशभर में निर्दिष्ट आकलन केंद्रों की संख्या 16 से बढ़ाकर 61 कर दी है, ताकि मूल्यांकन प्रक्रिया को अधिक सुलभ, पारदर्शी और एकरूपता वाला बनाया जा सके। भविष्य में आकलन बोर्ड का विस्तार चिकित्सा परामर्श समिति (एमसीसी) द्वारा अधिसूचित किया जाएगा।
एनएमसी ने कहा कि नये दिशानिर्देशों में क्षमता आधारित और कार्य-केंद्रित मूल्यांकन व्यवस्था लागू की गई है। इसके तहत किसी अभ्यर्थी की पात्रता केवल उसकी दिव्यांगता के प्रतिशत या यूडीआईडी कार्ड (विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र) में दर्ज श्रेणी के आधार पर तय नहीं की जाएगी।
दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत मानक दिव्यांगता वाले अभ्यर्थी आरक्षण के लिए पात्र बने रहेंगे, लेकिन एमबीबीएस में प्रवेश का फैसला अभ्यर्थी की वास्तविक कामकाजी क्षमताओं सहित अन्य योग्यताओं को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा।
किसी निर्दिष्ट श्रेणी में चिकित्सकीय स्तर पर प्रमाणित कम से कम 40 प्रतिशत दिव्यांगता को मानक दिव्यांगता माना जाता है।
नये दिशानिर्देशों में उचित सुविधा उपलब्ध कराने के लिए विस्तृत व्यवस्था की गई है। इसमें कहा गया है कि किसी अभ्यर्थी को अयोग्य घोषित करने से पहले चिकित्सा आकलन बोर्ड को यह देखना होगा कि क्या सहायक उपकरण, अनुकूल तकनीक या जरूरी बुनियादी ढांचे की मदद से वह एमबीबीएस पाठ्यक्रम को सफलतापूर्वक पूरा कर सकता है।
एनएमसी ने स्पष्ट किया है कि उचित सुविधा उपलब्ध कराना शैक्षणिक मानकों को कम करना नहीं है, बल्कि दिव्यांग अभ्यर्थियों को समान अवसर उपलब्ध कराने का माध्यम है।
उचित सुविधा के तहत सहायक उपकरण, अनुकूल प्रौद्योगिकी, डिजिटल पहुंच, सुगम अध्ययन सामग्री, संचार सहायता, परीक्षा में जरूरी बदलाव और दिव्यांगों के अनुकूल क्लिनिकल प्रशिक्षण वातावरण जैसी व्यवस्थाएं शामिल हो सकती हैं।
दिशानिर्देशों में कहा गया है कि हर आकलन व्यक्तिगत, निष्पक्ष और साक्ष्य आधारित होना चाहिए। किसी भी अभ्यर्थी को केवल दिव्यांगता की श्रेणी, प्रतिशत या यूडीआईडी कार्ड में दर्ज जानकारी के आधार पर पात्र या अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकेगा।
इसके अलावा, केवल किसी बीमारी, दिव्यांगता की श्रेणी, दिव्यांगता प्रतिशत या उससे जुड़े सामान्य पूर्वाग्रहों के आधार पर भी किसी अभ्यर्थी को एमबीबीएस प्रवेश से वंचित नहीं किया जा सकता।
दिशानिर्देशों में चिकित्सा आकलन बोर्ड के फैसले से असंतुष्ट अभ्यर्थियों के लिए अपील व्यवस्था का भी प्रावधान किया गया है। इसके लिए डीजीएचएस द्वारा गठित प्राधिकरण के समक्ष अपील की जा सकेगी।
एनएमसी ने मेडिकल कॉलेजों को निर्देश दिया है कि वे दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए सुगमता से आने जाने वाले परिसर उपलब्ध कराएं, पीडब्ल्यूबीडी छात्रों की सहायता के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त करें और शिकायतों के समाधान के लिए समयबद्ध एवं सुगम व्यवस्था बनाएं।
एनएमसी ने कहा कि एमबीबीएस प्रवेश-2026 के लिए जारी ये नये दिशानिर्देश दिव्यांग अभ्यर्थियों के आकलन से जुड़े सभी पुराने दिशानिर्देशों, परामर्शों और निर्देशों का स्थान लेंगे।
भाषा सुभाष नरेश
नरेश