नयी दिल्ली, 24 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने वैवाहिक विवाद में अलग रह रहे पति-पत्नी द्वारा बच्चों के यौन उत्पीड़न से जुड़ी झूठी शिकायतों की बढ़ती घटनाओं पर बृहस्पतिवार को चिंता जताते हुए कहा कि अगर आरोप किसी ऐसे माता-पिता या परिवार के सदस्य पर लगाया गया है, जो उसी घर में रहता है, तो आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।
न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में निर्देश दिया कि पुलिस या अदालतें ऐसे माता-पिता या परिवार के सदस्य की गिरफ्तारी पर राय बनाने से पहले विशेषज्ञों से बच्चे का मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सकीय मूल्यांकन जरूर कराएं।
न्यायालय ने कहा कि इस प्रक्रिया एवं आरोपों से बच्चे को होने वाला आघात माता-पिता और बच्चे के रिश्ते की बुनियाद को नुकसान पहुंचा सकता है तथा इससे उपजे घाव दोनों के मन में स्थायी छाप छोड़ सकता है।
पीठ ने कहा कि यह उस चोट, अपमान और सामाजिक बदनामी से अलग है, जिसका सामना आरोपी माता-पिता को आरोपों से बरी होने के काफी समय बाद तक भी करना पड़ सकता है।
न्यायालय ने कहा, ‘‘चिंता की बात यह है कि झूठे आरोप लगाने की यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। ऐसे मामले कम नहीं हैं, जिनमें कुछ मामलों में जिद्दी कानूनी पेशेवर सहित भोले-भाले पक्षकारों को उनके सलाहकारों द्वारा गुमराह किया जाता है। ये लोग ‘किसी भी कीमत पर जीत’ के सिद्धांत पर चलते हुए स्थिति को और बिगाड़ देते हैं।’’ न्यायालय ने कहा कि अक्सर गुस्से से भरा और अहंकार में डूबे माता-पिता परिणामों से अनजान रहते हुए ऐसी चालों का शिकार हो जाते हैं।
पीठ ने कहा कि अगर आरोप यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत ऐसे माता-पिता या परिवार के किसी अन्य सदस्य पर लगाया गया हो, जो बच्चे के साथ उसी घर में रहता हो या फिर बच्चे के माता-पिता के बीच किसी भी प्रकार का वैवाहिक विवाद हो, चाहे वह अदालत में लंबित हो या नहीं, जिससे उनके बीच तनावपूर्ण संबंध होने की संभावना दिखाई देती हो, तो आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी नहीं की जाएगी।
न्यायालय ने कहा कि शिकायत प्राप्त करने वाले पुलिस अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि शिकायत मिलने के समय यह सत्यापित करें कि बच्चे के माता-पिता के बीच कोई वैवाहिक विवाद है या नहीं।
पीठ ने निर्देश दिया कि जांच अधिकारी या स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट (एसजेपीयू) जांच में मदद के लिए जिला बाल संरक्षण इकाई (डीसीपीयू) या जहां डीसीपीयू उपलब्ध नहीं है, वहां जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) के परामर्श से बाल एवं किशोर मनोचिकित्सकों या मनोविज्ञान विशेषज्ञों की सेवाएं लें।
न्यायालय ने कहा कि असाधारण मामलों में, जहां तथ्य स्पष्ट हों, जांच अधिकारी लिखित रूप में कारण दर्ज करते हुए बाल एवं किशोर मनोचिकित्सकों या मनोविज्ञान विशेषज्ञों की सेवाएं लेने से छूट दे सकता है।
न्यायालय ने कहा, ‘‘यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मूल्यांकन स्वतंत्र तरीके से किया जाए और उस पर असंतुष्ट माता-पिता या जांच एजेंसियों का कोई प्रभाव न हो।’’
न्यायालय ने यह आदेश बेंगलुरु में अलग रह रहे दंपति के वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में दिया, जिसमें पत्नी ने बच्चे के यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया था।
मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने की थी और आरोप झूठा पाया।
शीर्ष अदालत ने नाबालिग बच्चे के हित को ध्यान में रखते हुए उसकी अभिरक्षा पिता को वापस सौंप दी।
भाषा जितेंद्र सुरेश
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