नयी दिल्ली, नौ जनवरी (भाषा) केंद्र ने शुक्रवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष यह तर्क दिया कि एयर प्यूरीफायर को ‘‘चिकित्सकीय उपकरण’’ के रूप में वर्गीकृत करने की याचिका में किए गए अनुरोध से निष्कर्ष निकलता है कि यह याचिका वास्तव में जनहित संबंधी किसी चिंता को दूर करने के उद्देश्य से दायर नहीं की गई, बल्कि यह ‘‘कपटपूर्ण’’ और ‘‘(विशेष लक्ष्य से) प्रेरित प्रयास’’ है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश वकील ने मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ के समक्ष कहा कि एयर प्यूरीफायर को चिकित्सीय उपकरण के रूप में वर्गीकृत करना जनहित याचिका के कथित उद्देश्य के लिए प्रतिकूल होगा, क्योंकि इससे एयर प्यूरीफायर पर अतिरिक्त विनियामक अनुपालन लागू होंगे और ऐसे बाजार में उनकी आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका है, जो पहले ही बाधाओं का सामना कर रहा है।
न्यायालय ने केंद्र के हलफनामे में याचिकाकर्ता के विरुद्ध दी गई दलीलों पर गौर किया और उसे अपना जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया। मामले में आगे की सुनवाई 19 मार्च को होगी।
केंद्र और वस्तु एवं सेवा कर परिषद की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एन वेंकटरमण ने एयर प्यूरीफायर को ‘‘चिकित्सीय उपकरण’’ के रूप में वर्गीकृत करने और उन पर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की दरें घटाने के निर्देश देने का अनुरोध करने वाली जनहित याचिका का विरोध करते हुए कहा कि कर से संबंधित मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य है।
केंद्र ने कहा कि यह याचिका जनहित की आड़ में विनियामक पुनर्वर्गीकरण हासिल करने का एक ‘‘कपटपूर्ण’’ और ‘‘(विशेष लक्ष्य से) प्रेरित प्रयास’’ है।
यह हलफनामा एयर प्यूरीफायर को ‘‘चिकित्सीय उपकरण’’ के रूप में वर्गीकृत करने और उन्हें जीएसटी की पांच प्रतिशत श्रेणी में लाने का निर्देश देने का अनुरोध करने वाली एक जनहित याचिका के जवाब में दाखिल किया गया। एयर प्यूरीफायर पर फिलहाल 18 प्रतिशत कर लगता है।
अधिवक्ता कपिल मदान द्वारा दायर याचिका में कहा गया कि दिल्ली में गंभीर वायु प्रदूषण से पैदा हुए ‘‘अत्यधिक आपात संकट’’ को देखते हुए एयर प्यूरीफायर को विलासिता की वस्तु नहीं माना जा सकता।
भाषा सिम्मी दिलीप
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