(प्रदीप्त तपदार)
लालगोला (प. बंगाल), 16 अप्रैल (भाषा) पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद क्षेत्र के प्रवासी बहुल -समसेरगंज और लालगोला- में महिला मतदाता एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभर रही हैं। कई महिलाओं का कहना है कि रोजगार, प्रवास और मतदाता सूची से नाम हटाए जाने जैसे मुद्दों को लेकर उनकी चिंताएं अब चुनाव प्रचार में हावी ‘पहचान की राजनीति’ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।
इन दोनों निर्वाचन क्षेत्रों के हजारों पुरुष केरल, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और खाड़ी देशों में कार्यरत हैं, ऐसे में महिलाएं घर-परिवार संभालने के साथ ही बैंकों और सरकारी कार्यालयों के काम भी खुद ही करती हैं और पहली बार अपने राजनीतिक निर्णय खुद ले रही हैं।
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में समसेरगंज में लगभग 92,000 नाम और पड़ोसी लालगोला में लगभग 69,000 नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाने के बाद इस बदलाव का महत्व और भी बढ़ गया है।
मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटने से महिलाओं में व्यापक चिंता पैदा हो गई है, जिनमें से कई अब अपना पूरा दिन आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर कार्ड लेकर बूथ कार्यालयों में जाने में बिताती हैं, जबकि उनके पति और बेटे घर से दूर काम करते हैं।
समसेरगंज की रेहाना बीबी के पति कोच्चि में काम करते हैं। रेहाना ने कहा, ‘‘हर चुनाव में, वे पूछते हैं कि हम हिंदू हैं या मुसलमान। कोई यह नहीं पूछता कि मेरे पति केरल में बर्तन क्यों धो रहे हैं।’’
अब रेहाना घर का सारा काम संभालती हैं, हर महीने पैसे भेजने वाले बैंक खाते का हिसाब रखती हैं और मतदाता सूची से कई नाम हटने की खबर मिलने के बाद उन्होंने कई बार बीएलओ कार्यालय के चक्कर लगाए हैं।
समसेरगंज के एक अन्य गांव में रहने वालीं 38-वर्षीय हसीना खातून पहले के चुनावों में मुंबई में रहने वाले अपने पति के निर्देशों का पालन करती थीं, लेकिन उन्होंने कहा कि अब महिलाएं अपने गांवों में क्या हो रहा है, इसके बारे में पुरुषों से ज्यादा जानती हैं।
हसीना खातून ने कहा, ‘‘पहले मेरे पति ने मुझसे एक पार्टी को वोट देने को कहा था, क्योंकि वह बाहर रहकर कमाते थे और पैसे भेजते थे। लेकिन जब मतदाता सूची से नाम गायब हो जाते हैं, या राशन नहीं आता, तो हम जाकर लड़ते हैं। कोई नहीं पूछता कि मेरे बेटे को दुबई में होटल के कमरे क्यों साफ करने पड़ते हैं।’’
लालगोला में रहने वाली शबनम खातून ने बताया, ‘‘मेरे पति बेंगलुरु में एक निर्माण स्थल पर काम करते हैं, उन्होंने पिछले सप्ताह फोन करके मुझे बताया कि मुझे कौन सा बटन दबाना है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘पहले मैं अपने पति की बात मान लेती थी। इस बार मैंने उनसे कहा कि आप बेंगलुरु में रहिए और मैं यहां रहती हूं इसलिए मैं उसे वोट दूंगी जो यहां मेरी मदद करेगा।’’
भाषा शफीक सुरेश
सुरेश