चुनाव में दलों के खर्च की सीमा तय करने से जुड़ी याचिका पर केंद्र और आयोग को नोटिस भेजा

चुनाव में दलों के खर्च की सीमा तय करने से जुड़ी याचिका पर केंद्र और आयोग को नोटिस भेजा

चुनाव में दलों के खर्च की सीमा तय करने से जुड़ी याचिका पर केंद्र और आयोग को नोटिस भेजा
Modified Date: February 26, 2026 / 08:55 pm IST
Published Date: February 26, 2026 8:55 pm IST

नयी दिल्ली, 26 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को उस याचिका पर केंद्र और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा जिसमें चुनाव में राजनीतिक दलों द्वारा किए जाने वाले व्यय की सीमा तय करने को लेकर निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने याचिका पर केंद्र और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।

पीठ ने कहा, ‘‘नोटिस जारी करें, जिसका जवाब 27 अप्रैल को देना होगा।’’

याचिकाकर्ता गैर-सरकारी संगठनों कॉमन कॉज और ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण उपस्थित हुए।

याचिका में कहा गया है कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77(1) के तहत व्यक्तिगत उम्मीदवारों पर सख्त सीमाएं होने के बावजूद राजनीतिक दलों पर कोई व्यय सीमा न होने से चुनावी प्रतिस्पर्धा में असमानता पैदा होती है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

इसमें कहा गया है, ‘‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 77(1) के स्पष्टीकरण 1(ए) के तहत राजनीतिक दलों द्वारा किसी उम्मीदवार के चुनाव के संबंध में किए गए भारी व्यय को हिसाब से बाहर रखकर एक कानूनी कल्पना का निर्माण किया गया है, भले ही ये व्यय उसी चुनावी उद्देश्य की पूर्ति करते हों।’’

याचिका में कहा गया कि अधिनियम की धारा 77(1) चुनाव के दौरान व्यक्तिगत उम्मीदवारों द्वारा किए गए खर्च पर सीमा लगाती है।

इसमें अधिनियम की धारा 77(1) के स्पष्टीकरण 1(ए) को असंवैधानिक घोषित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 19(1)(ए) का उल्लंघन करता है।

याचिका में कहा गया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव किसी भी लोकतंत्र की नींव होते हैं, और भारत जैसे संवैधानिक लोकतंत्र में तो यह और भी महत्वपूर्ण है।

याचिका में कहा गया, ‘‘इस न्यायालय ने बार-बार यह माना है कि लोकतंत्र, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव और विधि का शासन संविधान के मूलभूत तत्व हैं, जिसका अर्थ यह है कि इन्हें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से भी समाप्त नहीं किया जा सकता।’’

भाषा संतोष माधव

माधव


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