अब पूर्वोत्तर क्षेत्र की पहचान अवसरों से होती है, न कि दिल्ली से दूरी से : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

अब पूर्वोत्तर क्षेत्र की पहचान अवसरों से होती है, न कि दिल्ली से दूरी से : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन

अब पूर्वोत्तर क्षेत्र की पहचान अवसरों से होती है, न कि दिल्ली से दूरी से : उपराष्ट्रपति राधाकृष्णन
Modified Date: March 7, 2026 / 06:55 pm IST
Published Date: March 7, 2026 6:55 pm IST

आइजोल, सात मार्च (भाषा) उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने शनिवार को जोर देकर कहा कि पूर्वोत्तर को अब राष्ट्रीय राजधानी से उसकी भौगोलिक दूरी से नहीं, बल्कि नए आर्थिक अवसरों की निकटता से परिभाषित किया जाता है।

यहां मिजोरम विश्वविद्यालय (एमजेडयू) के 20वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने पिछले दशक में क्षेत्र के विकास के दृष्टिकोण में आए बदलाव का उल्लेख किया और इसका श्रेय केंद्र सरकार द्वारा ‘एक्ट ईस्ट’ नीति पर दिए गए ध्यान को दिया।

उन्होंने कहा कि हाल ही में शुरू हुई बैराबी-सैरांग रेलवे लाइन सहित बेहतर आवागमन सुविधा और ‘उड़ान’ एवं ‘पीएम-डिवाइन’ जैसी पहलों से विकास में तेजी आ रही है और इस क्षेत्र के लोगों को नए अवसरों के निकट लाया जा रहा है।

स्नातक छात्रों को बधाई देते हुए राधाकृष्णन ने उनसे स्वयं को “विकसित भारत के निर्माता” के रूप में देखने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि आइजोल की सुरम्य पहाड़ियों में स्थित यह विश्वविद्यालय, शांति और उद्देश्य पर आधारित शिक्षा की परिवर्तनकारी शक्ति का एक प्रमाण है।

उपराष्ट्रपति ने कहा, “पूर्वोत्तर के युवाओं से नौकरी की तलाश से आगे बढ़कर अवसरों के सृजन पर ध्यान केन्द्रित करने का आग्रह किया।”

उन्होंने पूर्वोत्तर क्षेत्र में पर्यटन, बांस पर आधारित उद्योगों, जैविक कृषि, हस्तशिल्प और डिजिटल सेवाओं जैसे सेक्टरों की अपार संभावनाओं को रेखांकित किया।

युवाओं में मादक पदार्थों के दुरुपयोग के बढ़ते खतरे पर चिंता व्यक्त करते हुए, उन्होंने युवाओं से मादक पदार्थों से दूर रहने और अनुशासित एवं उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने का आह्वान किया।

उन्होंने विद्यार्थियों को प्रौद्योगिकी एवं सोशल मीडिया का जिम्मेदारीपूर्वक उपयोग करने की सलाह दी।

दीक्षांत समारोह में मिजोरम के राज्यपाल एवं मिजोरम विश्वविद्यालय के मुख्य रेक्टर जनरल विजय कुमार सिंह, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा, मिजोरम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर दिबाकर चंद्र डेका भी उपस्थित थे।

भाषा प्रशांत पवनेश

पवनेश


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