राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय पार्टियों की मान्यता देने के खिलाफ दायर याचिका खारिज

राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय पार्टियों की मान्यता देने के खिलाफ दायर याचिका खारिज

राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय, राज्य स्तरीय पार्टियों की मान्यता देने के खिलाफ दायर याचिका खारिज
Modified Date: January 9, 2026 / 05:33 pm IST
Published Date: January 9, 2026 5:33 pm IST

नयी दिल्ली, नौ जनवरी (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्वाचन आयोग की ओर से राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय पार्टियों के रूप में मान्यता दिए जाने के खिलाफ दायर याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी।

न्यायमूर्ति नितिन वी सांब्रे और न्यायमूर्ति अनीश दयाल की पीठ ने कहा, “उच्चतम न्यायालय के पिछले फैसलों में (इस मुद्दे को) संबोधित किया जा चुका है। हमने याचिका खारिज कर दी है।”

फैसले की विस्तृत प्रति अभी उपलब्ध नहीं कराई गई है।

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याचिकाकर्ता ‘हिंद साम्राज्य पार्टी’ ने चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश 1968 की वैधता को चुनौती दी थी, जिसके तहत राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय पार्टियों के रूप में वर्गीकृत किया जाता है।

याचिकाकर्ता एक पंजीकृत राजनीतिक दल है। उसने दलील दी थी कि निर्वाचन आयोग किसी राजनीतिक दल को राष्ट्रीय या राज्य स्तर की पार्टी के रूप में मान्यता प्रदान करने के लिए अधिकृत नहीं है।

‘हिंद साम्राज्य पार्टी’ ने कहा था कि चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश के उपभाग 6ए, 6बी और 6सी इस तरह का दर्जा देने के लिए निर्धारित मानदंड अनुचित और बिना किसी आधार के थे।

पार्टी ने कहा था कि उसे चुनाव के हर चरण में भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि मौजूदा राजनीतिक दल, जिन्हें अवैध रूप से राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों के रूप में मान्यता दी गई है, विशेष अधिकारों और सुविधाओं का लाभ उठाते हैं।

याचिका में ‘हिंद साम्राज्य पार्टी’ ने कहा था कि राष्ट्रीय/राज्य स्तर के राजनीतिक दलों को चुनाव प्रचार के लिए चुनाव चिह्न चुनाव से काफी पहले ही आवंटित होते हैं, जबकि “नवगठित राजनीतिक पार्टी” के उम्मीदवारों को चुनाव की तारीख के बाद ही चिह्न मिलता है, जिससे उनके पास बहुत कम समय बचता है।

याचिका में दलील दी गई थी कि पंजीकृत राजनीतिक दलों के बीच कोई भेदभाव नहीं हो सकता, क्योंकि राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय राजनीतिक दल की अवधारणा संविधान, लोकतंत्र और कानून के शासन के प्रावधानों के विपरीत है।

इसमें कहा गया था, “उपभाग 6ए, 6बी और 6सी में शामिल प्रावधान जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के मूल सिद्धांत के साथ-साथ स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की अवधारणा के भी खिलाफ हैं, जो भारत के संविधान की मूलभूत विशेषताओं में से एक है।”

भाषा पारुल नरेश

नरेश


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