एससी/एसटी अधिनियम में हुए संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज

एससी/एसटी अधिनियम में हुए संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज

एससी/एसटी अधिनियम में हुए संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका खारिज
Modified Date: September 22, 2026 / 07:00 pm IST
Published Date: September 22, 2026 7:00 pm IST

नयी दिल्ली, 22 सितंबर (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में 2018 में किए गए संशोधन की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर विचार करने से मंगलवार को इनकार कर दिया।

इस संशोधन के जरिये अग्रिम जमानत पर लगी पाबंदियों को बहाल कर दिया गया था।

संशोधित कानून के माध्यम से, प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक पूछताछ की आवश्यकता और गिरफ्तारी से पहले मंजूरी की अनिवार्यता भी खत्म कर दी गई थी।

प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने बृजभूषण सैनी की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि संशोधित प्रावधानों को शीर्ष अदालत 2020 में सही ठहरा चुकी है।

पीठ ने सैनी की ओर से पेश वकील विष्णु शंकर जैन की यह दलील खारिज कर दी कि 2020 के फैसले पर पुनर्विचार किया जाए।

अदालत ने कहा कि इन प्रावधानों के संभावित दुरुपयोग के खिलाफ पहले से ही पर्याप्त सुरक्षा उपाय निर्धारित किए गए हैं।

शीर्ष अदालत ने अपने 2018 के फैसले में निर्देश दिया था कि एससी/एसटी अधिनियम के तहत कुछ परिस्थितियों में प्राथमिकी दर्ज करने से पहले प्रारंभिक पूछताछ की जाए और किसी लोक सेवक की गिरफ्तारी से पहले उसे नियुक्त करने वाले प्राधिकारी की मंजूरी ली जाए।

अदालत ने यह भी माना था कि ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत दी जा सकती है जहां प्रथम दृष्टया कोई मामला न बनता हो।

इस फैसले के बाद, संसद ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2018 पेश किया और कानून में धारा 18ए जोड़ी।

धारा 18ए में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान किया गया कि प्राथमिकी दर्ज करने के लिए किसी प्रारंभिक पूछताछ की आवश्यकता नहीं होगी और अभियुक्त की गिरफ्तारी के लिए कोई पूर्व स्वीकृति आवश्यक नहीं होगी।

इसके अलावा अग्रिम जमानत पर कानून के तहत लगे वैधानिक प्रतिबंध को भी बहाल कर दिया गया।

बाद में 2020 में ‘पृथ्वी राज चौहान बनाम भारत संघ’ मामले में उच्चतम न्यायालय ने संशोधन की संवैधानिक वैधता को सही ठहराया था।

भाषा जोहेब नरेश

नरेश


लेखक के बारे में