पुलिस पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत अपराधों की स्वतंत्र जांच नहीं कर सकती: उच्चतम न्यायालय

पुलिस पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत अपराधों की स्वतंत्र जांच नहीं कर सकती: उच्चतम न्यायालय

पुलिस पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत अपराधों की स्वतंत्र जांच नहीं कर सकती: उच्चतम न्यायालय
Modified Date: August 20, 2026 / 09:48 pm IST
Published Date: August 20, 2026 9:48 pm IST

नयी दिल्ली, 20 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को कहा कि पुलिस गर्भधारण-पूर्व एवं प्रसव-पूर्व निदान तकनीक (पीसीपीएनडीटी) अधिनियम के तहत अपराधों की स्वतंत्र जांच शुरू नहीं कर सकती है।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून के तहत नामित प्राधिकारियों को कार्रवाई करनी चाहिए।

पीसीपीएनडीटी अधिनियम भ्रूण के लिंग का पता लगाने के लिए प्रसव-पूर्व निदान तकनीकों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के मकसद से लागू किया गया था।

शीर्ष अदालत ने कहा कि पुलिस मुख्य जांच एजेंसी नहीं हो सकती और वह जरूरत पड़ने पर संबंधित प्राधिकार की देखरेख में सहायक भूमिका निभा सकती है।

पीठ ने कहा, “अधिनियम की भाषा, खास तौर पर इसकी धारा 27 और 28 को एक साथ पढ़े जाने पर, साथ ही अन्य प्रावधानों, कानून की सामाजिक रूप से कल्याणकारी प्रकृति और चिकित्सा व तकनीकी जानकारी की आवश्यकता के साथ इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि इस अधिनियम के तहत जांच करने का काम पुलिस का नहीं है।”

उसने कहा, “यह बात इस तथ्य से और भी स्पष्ट हो जाती है कि एक बार प्राथमिकी दर्ज होने के बाद भी मामले को अधिनियम में निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत उसके तार्किक अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता। यह पाबंदी सिर्फ इस अधिनियम के दायरे में आने वाले अपराधों पर लागू होती है और इससे मूल आपराधिक कानून (आईपीसी/बीएनएस) के तहत सामने आने वाले अपराधों की जांच करने या मुकदमा चलाने की पुलिस की शक्ति प्रभावित नहीं होती।”

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि इस कानून के सामाजिक रूप से कल्याणकारी स्वरूप और डॉक्टरों को उत्पीड़न या डराने-धमकाने से बचाने की आवश्यकता को देखते हुए यह रुख अपनाया गया है।

शीर्ष अदालत का यह फैसला गर्भधारण-पूर्व एवं प्रसव-पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम-1994 के तहत प्राथमिकी दर्ज करने और अपराधों की जांच करने की पुलिस की शक्ति से जुड़े मामले में आया है।

पीसीपीएनडीटी अधिनियम के तहत क्या मजिस्ट्रेट अपराध का संज्ञान ले सकते हैं, इस सवाल पर न्यायालय ने कहा कि अधिनियम की धारा 28 के तहत उन परिस्थितियों और मामलों को छोड़कर अपराध का संज्ञान लेने पर पूरी तरह से वैधानिक रोक लगाई गई है, जिनका उसमें (धारा 28) जिक्र किया गया है।

पीठ ने कहा, “जवाब स्पष्ट होना चाहिए। सक्षम मजिस्ट्रेट आरोपपत्र दाखिल होने पर संज्ञान नहीं ले सकते।”

न्यायमूर्ति सिंह ने अलग से सहमति वाला फैसला लिखते हुए कहा कि अगर अपराध केवल लिंग निर्धारण, भ्रूण के लिंग की जानकारी देने, प्रतिबंधित निदान तकनीक का इस्तेमाल करने या पीसीपीएनडीटी अधिनियम के दायरे में आने वाले अन्य अवैध कृत्यों से संबंधित है, तो पुलिस को उस जांच से दूर रहना चाहिए, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी उससे सहायता न मांगें।

उन्होंने कहा कि इसके उलट, अगर जानबूझकर किए गए किसी चिकित्सकीय कृत्य की वजह से मौत, हत्या, भ्रूण-हत्या या उससे जुड़े दूसरे अपराध होते हैं और घटना के तथ्य सामान्य दंड कानून के तहत अपराध की शर्तों को पूरा करते हैं, तो पुलिस उन अपराधों की जांच कर सकती है।

भाषा पारुल अविनाश

अविनाश


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