नयी दिल्ली, 11 अगस्त (भाषा) राष्ट्रीय राजधानी में ‘प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया’ में मंगलवार को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के पूर्व छात्र उमर खालिद की किताब ‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज़: आदिवासी हिस्ट्रीज़ एंड द पॉलिटिक्स ऑफ़ पावर’ पर परिचर्चा हुई, जिसमें वक्ताओं ने आदिवासी इतिहास पर एक अकादमिक काम के तौर पर इसकी महत्ता रेखांकित की।
यह कार्यक्रम जेल में खालिद के छठे जन्मदिन के मौके पर आयोजित किया गया। कार्यक्रम में राज्यसभा सदस्य मनोज झा, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद झा, प्रोफ़ेसर प्रभु महापात्रा, वरिष्ठ पत्रकार आरफ़ा खानुम शेरवानी और ‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन समेत कई लोगों ने हिस्सा लिया।
दिल्ली में 2020 में हुए दंगों संबंधी मामले के सिलसिले में जेल में बंद खालिद ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अपनी ‘पीएचडी थीसिस’ के तौर पर यह पुस्तक लिखी है।
खालिद की ‘थीसिस’ की जांच करने वालों में से एक, महापात्रा ने कहा कि उन्हें इस काम से ‘जुड़ाव’ महसूस हुआ जो आज के झारखंड में सिंहभूम के इतिहास और उन राजनीतिक एवं प्रशासनिक ढांचों की पड़ताल करता है जिन्होंने वहां के आदिवासी समुदायों को आकार दिया।
महापात्रा ने कहा, ‘‘वह एक नज़रिए को दूसरे के खिलाफ़ खड़ा करने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। वह कई विरोधाभासों को देख रहे हैं और उन्हें एक साथ पेश कर रहे हैं। इतिहास को देखने का यह एक बहुत ही दिलचस्प तरीका है।’’
खालिद की मां सबीहा खानुम ने कहा कि यह परिवार के लिए ‘खुशी और दुख का पल’ है, क्योंकि किताब तो पाठकों के लिए उपलब्ध हो गई, लेकिन इसका लेखक जेल में है।
उन्होंने कहा कि खालिद ने पुलिस और अदालती कार्यवाही के बीच अपनी ‘थीसिस’ पूरी की और आखिरकार अदालत के दखल से इसे जमा करना मुमकिन हो पाया।
खानुम ने लोगों से अपील की कि वे इस किताब को सिर्फ़ इसलिए न पढ़ें कि इसका लेखक जेल में है, बल्कि इसकी अकादमिक अहमियत के लिए पढ़ें।
खालिद को सितंबर 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़ी बड़ी साज़िश के मामले में गिरफ़्तार किया गया था और तब से वह दोष सिद्धि के बिना न्यायिक हिरासत में हैं।
भाषा
राजकुमार नरेश
नरेश